Tuesday, April 5, 2011

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यह सुझाव दिया जाता है कि इस लेख या भाग का अंग्रेजी भाषा के साथ विलय कर दिया जाए। (वार्ता)भाषा का नाम
बोली जाती है —
क्षेत्र —
कुल बोलने वाले —
भाषा परिवार —
{{{name}}}

भाषा कूट
ISO 639-1 None
ISO 639-2 –टन्कण
ISO 639-3 –
Note: This page may contain IPA phonetic symbols in Unicode.
अंग्रेज़ी भाषा (अंग्रेज़ी: English हिन्दी उच्चारण: इंग्लिश) हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार में आती है और इस दृष्टि से हिंदी, उर्दू, फ़ारसी आदि के साथ इसका दूर का संबंध बनता है। ये इस परिवार की जर्मनिक शाखा में रखी जाती है। इसे दुनिया की सर्वप्रथम अन्तर्राष्ट्रीय भाषा माना जाता है। ये दुनिया के कई देशों की मुख्य राजभाषा है और आज के दौर में कई देशों में (मुख्यतः भूतपूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों में) विज्ञान, कम्प्यूटर, साहित्य, राजनीति, और उच्च शिक्षा की भी मुख्य भाषा है। अंग्रेज़ी भाषा रोमन लिपि में लिखी जाती है।

अनुक्रम [छुपाएँ]
१ इतिहास
२ ध्वनियाँ
२.१ स्वर
२.२ व्यंजन
२.३ ध्वनि-अक्षरमाला सम्बन्ध
३ शब्दावली
४ व्याकरण
५ भाषाई साम्राज्यवाद एवं अंग्रेज़ी
६ इन्हें भी देखें
७ बाहरी कड़ियाँ


इतिहास
पाँचवीं और छठी सदी में ब्रिटेन के द्वीपों पर उत्तर की ओर से एंगल और सेक्सन क़बीलों ने हमला किया था और उन्होंने केल्टिक भाषाएँ बोलने वाले स्थानीय लोगों को स्कॉटलैंड, आयरलैंड और वेल्स की ओर धकेल दिया था।

आठवीं और नवीं सदी में उत्तर से वाइकिंग्स और नोर्स क़बीलों के हमले भी आरंभ हो गए थे और इस प्रकार वर्तमान इंगलैंड का क्षेत्र कई प्रकार की भाषा बोलने वालों का देश बन गया, और कई पुराने शब्दों को नए अर्थ मिल गए। जैसे – ड्रीम (dream) का अर्थ उस समय तक आनंद लेना था लेकिन उत्तर के वाइकिंग्स ने इसे सपने का अर्थ दे दिया। इसी प्रकार स्कर्ट का शब्द भी उत्तरी हमलावरों के साथ यहाँ आया। लेकिन इसका रूप बदल कर शर्ट (shirt) हो गया। बाद में दोनों शब्द अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होने लगे और आज तक हो रहे हैं।

सन् ५०० से लेकर ११०० तक के काल को पुरानी अंग्रेज़ी का दौर कहा जाता है। १०६६ ईस्वी में ड्यूक ऑफ़ नॉरमंडी ने इंगलैंड पर हमला किया और यहाँ के एंग्लो-सैक्सॉन क़बीलों पर विजय पाई। इस प्रकार पुरानी फ़्रांसीसी भाषा के शब्द स्थानीय भाषा में मिलने लगे। अंग्रेज़ी का यह दौर ११०० से १५०० तक जारी रहा और इसे अंग्रेज़ी का विस्तार वाला दौर मध्यकालीन अंग्रेज़ी कहा जाता है। क़ानून और अपराध-दंड से संबंध रखने वाले बहुत से अंग्रेज़ी शब्द इसी काल में प्रचलित हुए। अंग्रेज़ी साहित्य में चौसर (Chaucer) की शायरी को इस भाषा का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया जाता है।

सन् १५०० के बाद अंग्रेज़ी का आधुनिक काल आरंभ होता है जिसमें यूनानी भाषा के कुछ शब्दों ने मिलना आरंभ किया। यह दौर का शेक्सपियर जैसे साहित्यकार के नाम से आरंभ होता है और ये दौर सन १८०० तक चलता है। उसके बाद अंग्रेज़ी का आधुनिकतम दौर कहलाता है जिसमें अंग्रेज़ी व्याकरण सरल हो चुका है और उसमें अंग्रेज़ों के नए औपनिवेशिक एशियाई और अफ्रीक़ी लोगों की भाषाओं के बहुत से शब्द शामिल हो चुके हैं।
विश्व राजनीति, साहित्य, व्यवसाय आदि में अमरीका के बढ़ती हुए प्रभाव से अमरीकी अंग्रेज़ी ने भी विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है। इसका दूसरा कारण ब्रिटिश लोगों का साम्राज्यवाद भी था। वर्तनी की सरलता और बात करने की सरल और सुगम शैली अमरीकी अंग्रेज़ी की विशेषताएँ हैं।

ध्वनियाँ
स्वर
IPA विवरण हिन्दी उच्चारण (लगभग) अंग्रेज़ी शब्द अंग्रेज़ी स्पेलिंग के अक्षर
en:monophthongs
i/iː en:Close front unrounded vowel ई machine e, ee, ea, ie, i, ey, eo
ɪ en:Near-close near-front unrounded vowel इ bit i, e, y, a, u, ee, ey, ia, ai, ui, ei
ɛ en:Open-mid front unrounded vowel *छोटा ऍ red e, ea, a, u, ie, ei, ai, ay
æ en:Near-open front unrounded vowel *ऐ cat a
ɒ en:Open back rounded vowel *छोटा ऑ hot o, ua, au, ou, ow
ɔ en:Open-mid back rounded vowel *औ c'aught a, or, our, ore, ough, oor, aw, al, oar, ough, o, ar
ɑ/ɑː en:Open back unrounded vowel आ father a, au, e, ea
ʊ en:Near-close near-back rounded vowel उ put u, o, ou, oo, oe
u/uː en:Close back rounded vowel ऊ rule u, oo, o, ou, ui, ew, eau, oe, wo
ʌ/ɐ en:Open-mid back unrounded vowel, en:Near-open central vowel *छोटा आ cut u, o, ou, oo, oe
ɝ/ɜː en:Open-mid central unrounded vowel लम्बा अ bird er, ir, ur, or, ear, our
ə en:Schwa अ above a, ar, e, er, o (unstressed)
ɨ en:Close central unrounded vowel *छोटा इ rosez es, i
en:diphthongs
eɪ en:Close-mid front unrounded vowel
en:Close front unrounded vowel *एइ gate a, ay, ai, ey, ea
oʊ/əʊ en:Close-mid back rounded vowel
en:Near-close near-back rounded vowel *ओउ home o, ow, oa, ou
aɪ en:Open front unrounded vowel
en:Near-close near-front rounded vowel आइ time i, y, igh, ei, uy
aʊ en:Open front unrounded vowel
en:Near-close near-back rounded vowel आउ house ou, ow
ɔɪ en:Open-mid back rounded vowel
en:Close front unrounded vowel *ऑइ spoil oi, oy

व्यंजन
bilabial ओष्ठ्य Labiodental दन्त्योष्ठ्य dental दन्त्य alveolar वर्त्स्य post-
alveolar परा-वर्त्स palatal तालव्य velar कण्ठ्य glottal काकल्य
plosive स्पर्श p प b ब t *त--ट d *द--ड k क g ग
nasal अनुनासिक m म n न ŋ ङ
flap उत्क्षिपित ɾ *र
fricative संघर्षी f *फ़ v *व θ *थ ð *द s स z *ज़ ʃ *श ʒ *श्झ h *ह
affricate स्पर्श-संघर्षी tʃ *च dʒ *ज
en:approximant अर्धस्वर w *व ɹ *र j य
lateral approximant पार्श्विक l ल, ɫ *ल

यहाँ * का अर्थ उन स्वरों पर निशान लगाना है जो हिन्दी के ध्वनि-तन्त्र में नहीं होते, या जिनका शुद्ध उच्चारण अधिकांश भारतीय नहीं कर पाते ।

ध्वनि-अक्षरमाला सम्बन्ध
IPA वर्ण्माला का अक्षर अन्य बोलियों में
p p
b b
t t, th (rarely) thyme, Thames th thing ( African-American, New York)
d d th that ( African-American, New York)
k c (+ a, o, u, consonants), k, ck, ch, qu (rarely) conquer, kh (in foreign words)
g g, gh, gu (+ a, e, i), gue (final position)
m m
n n
ŋ n (before g or k), ng
f f, ph, gh (final, infrequent) laugh, rough th thing (many forms of English used in England)
v v th with ( en:Cockney, en:Estuary English)
θ th : there is no obvious way to identify which is which from the spelling.
ð
s s, c (+ e, i, y), sc (+ e, i, y)
z z, s (finally or occasionally medially),

शब्दावली
चूँकी अंग्रेज़ी एक जर्मनिक भाषा है, उसकी अधिकतर दैनिक उपयोग की शब्दावली प्राचीन जर्मन से आयी है । इसके अतिरिक्त भी अंग्रेज़ी में कई ऋणशब्द हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार स्थिति ये है :

फ़्रांसिसी और प्राचीन फ़्रांसिसी : २८.३ %
लैटिन : २८.२ %
प्राचीन ग्रीक : ५.३२ %
प्राचीन अंग्रेज़ी, प्राचिन नॉर्स और डच : २५ %
व्याकरण
यह अनुभाग खाली है, अर्थात पर्याप्त रूप से विस्तृत नहीं है या अधूरा है। आपकी सहायता का स्वागत है!



भाषाई साम्राज्यवाद एवं अंग्रेज़ी
अंग्रेज़ों ने दुनिया के अनेक देशों को राजनैतिक रूप से अपना उपनिवेश बनाया। इसके साथ ही उन्होंने उन देशों पर बड़ी चालाकी से अंग्रेज़ी भी लाद दी। इसी का परिणाम है कि आज ब्रिटेन के बाहर सं रा अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, कनाडा, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश्, दक्षिण अफ्रिका आदि अनेक देशों में अंग्रेज़ी का वर्चस्व है। अंग्रेज़ी ने यहां कि देशी भाषाओं को बुरी तरह पंगु बना रखा है। ब्रिटिश काउन्सिल जैसी संस्थायें इस अंग्रेज़ी के प्रसार के लिये तरह-तरह के दुष्प्रचार एवं गुप्त अभियान करती रहतीं हैं।

इन्हें भी देखें
अंग्रेजी साहित्य
बाहरी कड़ियाँ
अंगरेजी भाषा का संक्षिप्त ऐतिहासिक वृत्तांत
राष्ट्रीय अस्मिता और अंग्रेजी (लेखक - ऋषिकेश राय)

eng

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बोली जाती है —
क्षेत्र —
कुल बोलने वाले —
भाषा परिवार —
{{{name}}}

भाषा कूट
ISO 639-1 None
ISO 639-2 –टन्कण
ISO 639-3 –
Note: This page may contain IPA phonetic symbols in Unicode.
अंग्रेज़ी भाषा (अंग्रेज़ी: English हिन्दी उच्चारण: इंग्लिश) हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार में आती है और इस दृष्टि से हिंदी, उर्दू, फ़ारसी आदि के साथ इसका दूर का संबंध बनता है। ये इस परिवार की जर्मनिक शाखा में रखी जाती है। इसे दुनिया की सर्वप्रथम अन्तर्राष्ट्रीय भाषा माना जाता है। ये दुनिया के कई देशों की मुख्य राजभाषा है और आज के दौर में कई देशों में (मुख्यतः भूतपूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों में) विज्ञान, कम्प्यूटर, साहित्य, राजनीति, और उच्च शिक्षा की भी मुख्य भाषा है। अंग्रेज़ी भाषा रोमन लिपि में लिखी जाती है।

अनुक्रम [छुपाएँ]
१ इतिहास
२ ध्वनियाँ
२.१ स्वर
२.२ व्यंजन
२.३ ध्वनि-अक्षरमाला सम्बन्ध
३ शब्दावली
४ व्याकरण
५ भाषाई साम्राज्यवाद एवं अंग्रेज़ी
६ इन्हें भी देखें
७ बाहरी कड़ियाँ


इतिहास
पाँचवीं और छठी सदी में ब्रिटेन के द्वीपों पर उत्तर की ओर से एंगल और सेक्सन क़बीलों ने हमला किया था और उन्होंने केल्टिक भाषाएँ बोलने वाले स्थानीय लोगों को स्कॉटलैंड, आयरलैंड और वेल्स की ओर धकेल दिया था।

आठवीं और नवीं सदी में उत्तर से वाइकिंग्स और नोर्स क़बीलों के हमले भी आरंभ हो गए थे और इस प्रकार वर्तमान इंगलैंड का क्षेत्र कई प्रकार की भाषा बोलने वालों का देश बन गया, और कई पुराने शब्दों को नए अर्थ मिल गए। जैसे – ड्रीम (dream) का अर्थ उस समय तक आनंद लेना था लेकिन उत्तर के वाइकिंग्स ने इसे सपने का अर्थ दे दिया। इसी प्रकार स्कर्ट का शब्द भी उत्तरी हमलावरों के साथ यहाँ आया। लेकिन इसका रूप बदल कर शर्ट (shirt) हो गया। बाद में दोनों शब्द अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होने लगे और आज तक हो रहे हैं।

सन् ५०० से लेकर ११०० तक के काल को पुरानी अंग्रेज़ी का दौर कहा जाता है। १०६६ ईस्वी में ड्यूक ऑफ़ नॉरमंडी ने इंगलैंड पर हमला किया और यहाँ के एंग्लो-सैक्सॉन क़बीलों पर विजय पाई। इस प्रकार पुरानी फ़्रांसीसी भाषा के शब्द स्थानीय भाषा में मिलने लगे। अंग्रेज़ी का यह दौर ११०० से १५०० तक जारी रहा और इसे अंग्रेज़ी का विस्तार वाला दौर मध्यकालीन अंग्रेज़ी कहा जाता है। क़ानून और अपराध-दंड से संबंध रखने वाले बहुत से अंग्रेज़ी शब्द इसी काल में प्रचलित हुए। अंग्रेज़ी साहित्य में चौसर (Chaucer) की शायरी को इस भाषा का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया जाता है।

सन् १५०० के बाद अंग्रेज़ी का आधुनिक काल आरंभ होता है जिसमें यूनानी भाषा के कुछ शब्दों ने मिलना आरंभ किया। यह दौर का शेक्सपियर जैसे साहित्यकार के नाम से आरंभ होता है और ये दौर सन १८०० तक चलता है। उसके बाद अंग्रेज़ी का आधुनिकतम दौर कहलाता है जिसमें अंग्रेज़ी व्याकरण सरल हो चुका है और उसमें अंग्रेज़ों के नए औपनिवेशिक एशियाई और अफ्रीक़ी लोगों की भाषाओं के बहुत से शब्द शामिल हो चुके हैं।
विश्व राजनीति, साहित्य, व्यवसाय आदि में अमरीका के बढ़ती हुए प्रभाव से अमरीकी अंग्रेज़ी ने भी विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है। इसका दूसरा कारण ब्रिटिश लोगों का साम्राज्यवाद भी था। वर्तनी की सरलता और बात करने की सरल और सुगम शैली अमरीकी अंग्रेज़ी की विशेषताएँ हैं।

ध्वनियाँ
स्वर
IPA विवरण हिन्दी उच्चारण (लगभग) अंग्रेज़ी शब्द अंग्रेज़ी स्पेलिंग के अक्षर
en:monophthongs
i/iː en:Close front unrounded vowel ई machine e, ee, ea, ie, i, ey, eo
ɪ en:Near-close near-front unrounded vowel इ bit i, e, y, a, u, ee, ey, ia, ai, ui, ei
ɛ en:Open-mid front unrounded vowel *छोटा ऍ red e, ea, a, u, ie, ei, ai, ay
æ en:Near-open front unrounded vowel *ऐ cat a
ɒ en:Open back rounded vowel *छोटा ऑ hot o, ua, au, ou, ow
ɔ en:Open-mid back rounded vowel *औ c'aught a, or, our, ore, ough, oor, aw, al, oar, ough, o, ar
ɑ/ɑː en:Open back unrounded vowel आ father a, au, e, ea
ʊ en:Near-close near-back rounded vowel उ put u, o, ou, oo, oe
u/uː en:Close back rounded vowel ऊ rule u, oo, o, ou, ui, ew, eau, oe, wo
ʌ/ɐ en:Open-mid back unrounded vowel, en:Near-open central vowel *छोटा आ cut u, o, ou, oo, oe
ɝ/ɜː en:Open-mid central unrounded vowel लम्बा अ bird er, ir, ur, or, ear, our
ə en:Schwa अ above a, ar, e, er, o (unstressed)
ɨ en:Close central unrounded vowel *छोटा इ rosez es, i
en:diphthongs
eɪ en:Close-mid front unrounded vowel
en:Close front unrounded vowel *एइ gate a, ay, ai, ey, ea
oʊ/əʊ en:Close-mid back rounded vowel
en:Near-close near-back rounded vowel *ओउ home o, ow, oa, ou
aɪ en:Open front unrounded vowel
en:Near-close near-front rounded vowel आइ time i, y, igh, ei, uy
aʊ en:Open front unrounded vowel
en:Near-close near-back rounded vowel आउ house ou, ow
ɔɪ en:Open-mid back rounded vowel
en:Close front unrounded vowel *ऑइ spoil oi, oy

व्यंजन
bilabial ओष्ठ्य Labiodental दन्त्योष्ठ्य dental दन्त्य alveolar वर्त्स्य post-
alveolar परा-वर्त्स palatal तालव्य velar कण्ठ्य glottal काकल्य
plosive स्पर्श p प b ब t *त--ट d *द--ड k क g ग
nasal अनुनासिक m म n न ŋ ङ
flap उत्क्षिपित ɾ *र
fricative संघर्षी f *फ़ v *व θ *थ ð *द s स z *ज़ ʃ *श ʒ *श्झ h *ह
affricate स्पर्श-संघर्षी tʃ *च dʒ *ज
en:approximant अर्धस्वर w *व ɹ *र j य
lateral approximant पार्श्विक l ल, ɫ *ल

यहाँ * का अर्थ उन स्वरों पर निशान लगाना है जो हिन्दी के ध्वनि-तन्त्र में नहीं होते, या जिनका शुद्ध उच्चारण अधिकांश भारतीय नहीं कर पाते ।

ध्वनि-अक्षरमाला सम्बन्ध
IPA वर्ण्माला का अक्षर अन्य बोलियों में
p p
b b
t t, th (rarely) thyme, Thames th thing ( African-American, New York)
d d th that ( African-American, New York)
k c (+ a, o, u, consonants), k, ck, ch, qu (rarely) conquer, kh (in foreign words)
g g, gh, gu (+ a, e, i), gue (final position)
m m
n n
ŋ n (before g or k), ng
f f, ph, gh (final, infrequent) laugh, rough th thing (many forms of English used in England)
v v th with ( en:Cockney, en:Estuary English)
θ th : there is no obvious way to identify which is which from the spelling.
ð
s s, c (+ e, i, y), sc (+ e, i, y)
z z, s (finally or occasionally medially),

शब्दावली
चूँकी अंग्रेज़ी एक जर्मनिक भाषा है, उसकी अधिकतर दैनिक उपयोग की शब्दावली प्राचीन जर्मन से आयी है । इसके अतिरिक्त भी अंग्रेज़ी में कई ऋणशब्द हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार स्थिति ये है :

फ़्रांसिसी और प्राचीन फ़्रांसिसी : २८.३ %
लैटिन : २८.२ %
प्राचीन ग्रीक : ५.३२ %
प्राचीन अंग्रेज़ी, प्राचिन नॉर्स और डच : २५ %
व्याकरण
यह अनुभाग खाली है, अर्थात पर्याप्त रूप से विस्तृत नहीं है या अधूरा है। आपकी सहायता का स्वागत है!



भाषाई साम्राज्यवाद एवं अंग्रेज़ी
अंग्रेज़ों ने दुनिया के अनेक देशों को राजनैतिक रूप से अपना उपनिवेश बनाया। इसके साथ ही उन्होंने उन देशों पर बड़ी चालाकी से अंग्रेज़ी भी लाद दी। इसी का परिणाम है कि आज ब्रिटेन के बाहर सं रा अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, कनाडा, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश्, दक्षिण अफ्रिका आदि अनेक देशों में अंग्रेज़ी का वर्चस्व है। अंग्रेज़ी ने यहां कि देशी भाषाओं को बुरी तरह पंगु बना रखा है। ब्रिटिश काउन्सिल जैसी संस्थायें इस अंग्रेज़ी के प्रसार के लिये तरह-तरह के दुष्प्रचार एवं गुप्त अभियान करती रहतीं हैं।

इन्हें भी देखें
अंग्रेजी साहित्य
बाहरी कड़ियाँ
अंगरेजी भाषा का संक्षिप्त ऐतिहासिक वृत्तांत
राष्ट्रीय अस्मिता और अंग्रेजी (लेखक - ऋषिकेश राय)

Thursday, February 3, 2011

redio

Radio broadcasting is a one-way sound broadcasting service, transmitted over radio waves (a form of electromagnetic radiation) from a transmitter to a receiving antenna and intended to reach a wide audience. Stations can be linked in radio networks to broadcast common programming, either in syndication or simulcast or both. Audio broadcasting also can be done via cable FM, local wire networks, satellite and the Internet.
Contents [hide]
1 History
2 Types
2.1 Shortwave
2.2 AM
2.3 FM
2.4 Pirate radio
2.5 Terrestrial digital radio
2.6 Satellite
3 Program formats
4 See also
5 References
6 Further reading
7 External links
[edit]History

Main article: History of radio
The earliest radio stations were simply radiotelegraphy systems and did not carry audio. The first claimed audio transmission that could be termed a broadcast occurred on Christmas Eve in 1906, and was made by Reginald Fessenden. Whether this broadcast actually took place is disputed.[1] While many early experimenters attempted to create systems similar to radiotelephone devices where only two parties were meant to communicate, there were others who intended to transmit to larger audiences. Charles Herrold started broadcasting in California in 1909 and was carrying audio by the next year. (Herrold's station eventually became KCBS).
For the next decade, radio tinkerers had to build their own radio receivers. In The Hague, the Netherlands, PCGG started broadcasting on November 6, 1919. Dr. Frank Conrad began broadcasting from his Wilkinsburg, Pennsylvania garage with the call letters KDKA. KDKA's first commercial broadcast was made from Saxonburg, Butler County, PA on November 2, 1920. Later, the equipment was moved to the top of an office building in Pittsburgh, Pennsylvania and purchased by Westinghouse. KDKA of Pittsburgh, under Westinghouse's ownership, started broadcasting as the first licensed "commercial" radio station on November 2, 1920.[2] The commercial designation came from the type of license; advertisements did not air until years later. The first broadcast in USA was the results of the U.S. presidential election, 1920. The Montreal station that became CFCF began program broadcasts on May 20, 1920, and the Detroit station that became WWJ began program broadcasts beginning on August 20, 1920, although neither held a license at the time.
Radio Argentina began regularly scheduled transmissions from the Teatro Coliseo in Buenos Aires on August 27, 1920, making its own priority claim. The station got its license on November 19, 1923. The delay was due to the lack of official Argentine licensing procedures before that date. This station continued regular broadcasting of entertainment and cultural fare for several decades.[3]
Radio in education soon followed and colleges across the U.S. began adding radio broadcasting courses to their curricula. Curry College in Milton, Massachusetts introduced one of the first broadcasting majors in 1932 when the college teamed up with WLOE in Boston to have students broadcast programs.[4]
[edit]Types



Transmission and reception schematic
Broadcasting by radio takes several forms. These include AM and FM stations. There are several subtypes, namely commercial, public and nonprofit varieties as well as student-run campus radio stations and hospital radio stations can be found throughout the world.
Many stations that broadcast on shortwave bands using AM technology that can be received over thousands of miles (especially at night). For example, the BBC has a full schedule transmitted via shortwave to Africa and Asia. These broadcasts are very sensitive to atmospheric conditions and solar activity.
Arbitron, the United States based company that reports on radio audiences, defines a "radio station" as a government-licensed AM or FM station; an HD Radio (primary or multicast) station; an internet stream of an existing government-licensed station; one of the satellite radio channels from XM Satellite Radio or Sirius Satellite Radio; or, potentially, a station that is not government licensed.[5]
[edit]Shortwave
See Shortwave for the differences between shortwave, medium wave and long wave spectra. Used largely for national broadcasters, international propaganda, or religious organizations.
[edit]AM


AM radio broadcast stations in 2006
AM stations were the earliest broadcasting stations to be developed. AM refers to amplitude modulation, a mode of broadcasting radio waves by varying the amplitude of the carrier signal in response to the amplitude of the signal to be transmitted.
The medium-wave band is used worldwide for AM broadcasting. Europe also uses the long wave band. In response to the growing popularity of FM radio stereo radio stations in the late 1980s and early 1990s, some North American stations began broadcasting in AM stereo, though this never gained popularity, and very few receivers were ever sold.
One of the advantages of AM is that its signal can be detected (turned into sound) with simple equipment. If a signal is strong enough, not even a power source is needed; building an unpowered crystal radio receiver is a common childhood project.
AM broadcasts occur on North American airwaves in the medium wave frequency range of 530 to 1700 kHz (known as the "standard broadcast band"). The band was expanded in the 1990s by adding nine channels from 1620 to 1700 kHz. Channels are spaced every 10 kHz in the Americas, and generally every 9 kHz everywhere else.
The signal is subject to interference from electrical storms (lightning) and other EMI.
AM transmissions cannot be ionospherically propagated during the day due to strong absorption in the D-layer of the ionosphere. In a crowded channel environment this means that the power of regional channels which share a frequency must be reduced at night or directionally beamed in order to avoid interference, which reduces the potential nighttime audience. Some stations have frequencies unshared with other stations in North America; these are called clear-channel stations. Many of them can be heard across much of the country at night. This is not to be confused with Clear Channel Communications, merely a brand name, which currently owns many U.S. radio stations on both the AM and FM bands. During the night, this absorption largely disappears and permits signals to travel to much more distant locations via ionospheric reflections. However, fading of the signal can be severe at night.
AM radio transmitters can transmit audio frequencies up to 15 kHz (now limited to 10 kHz in the US due to FCC rules designed to reduce interference), but most receivers are only capable of reproducing frequencies up to 5 kHz or less. At the time that AM broadcasting began in the 1920s, this provided adequate fidelity for existing microphones, 78 rpm recordings, and loudspeakers. The fidelity of sound equipment subsequently improved considerably, but the receivers did not. Reducing the bandwidth of the receivers reduces the cost of manufacturing and makes them less prone to interference. AM stations are never assigned adjacent channels in the same service area. This prevents the sideband power generated by two stations from interfering with each other. Bob Carver created an AM stereo tuner employing notch filtering that demonstrated that an AM broadcast can meet or exceed the 15 kHz baseband bandwidth allocted to FM stations without objectionable interference. After several years, the tuner was discontinued. Bob Carver had left the company and the Carver Corporation later cut the number of models produced before discontinuing production completely. AM stereo broadcasts declined with the advent of HD Radio.
[edit]FM


FM radio broadcast stations in 2006
FM refers to frequency modulation, and occurs on VHF airwaves in the frequency range of 88 to 108 MHz everywhere (except Japan and Russia). Japan uses the 76 to 90 MHz band. Russia has two bands widely used by the Soviet Union, 65.9 to 74 MHz and 87.5 to 108 MHz worldwide standard. FM stations are much more popular since higher sound fidelity and stereo broadcasting became common in this format.
FM radio was invented by Edwin H. Armstrong in the 1930s for the specific purpose of overcoming the interference problem of AM radio, to which it is relatively immune. At the same time, greater fidelity was made possible by spacing stations further apart. Instead of 10 kHz apart, as on the AM band in the US, FM channels are 200 kHz (0.2 MHz) apart. In other countries greater spacing is sometimes mandatory, such as in New Zealand, which uses 700 kHz spacing (previously 800 kHz). The improved fidelity made available was far in advance of the audio equipment of the 1940s, but wide interchannel spacing was chosen to take advantage of the noise-suppressing feature of wideband FM.
Bandwidth of 200 kHz is not needed to accommodate an audio signal — 20 kHz to 30 kHz is all that is necessary for a narrowband FM signal. The 200 kHz bandwidth allowed room for ±75 kHz signal deviation from the assigned frequency, plus guard bands to reduce or eliminate adjacent channel interference. The larger bandwidth allows for broadcasting a 15 kHz bandwidth audio signal plus a 38 kHz stereo "subcarrier"—a piggyback signal that rides on the main signal. Additional unused capacity is used by some broadcasters to transmit utility functions such as background music for public areas, GPS auxiliary signals, or financial market data.
The AM radio problem of interference at night was addressed in a different way. At the time FM was set up, the available frequencies were far higher in the spectrum than those used for AM radio - by a factor of approximately 100. Using these frequencies meant that even at far higher power, the range of a given FM signal was much shorter; thus its market was more local than for AM radio. The reception range at night is the same as in the daytime.
The original FM radio service in the U.S. was the Yankee Network, located in New England.[6][7][8] Regular FM broadcasting began in 1939, but did not pose a significant threat to the AM broadcasting industry. It required purchase of a special receiver. The frequencies used, 42 to 50 MHz, were not those used today. The change to the current frequencies, 88 to 108 MHz, began after the end of World War II, and was to some extent imposed by AM broadcasters as an attempt to cripple what was by now realized to be a potentially serious threat.
FM radio on the new band had to begin from the ground floor. As a commercial venture it remained a little-used audio enthusiasts' medium until the 1960s. The more prosperous AM stations, or their owners, acquired FM licenses and often broadcast the same programming on the FM station as on the AM station ("simulcasting"). The FCC limited this practice in the 1970s. By the 1980s, since almost all new radios included both AM and FM tuners, FM became the dominant medium, especially in cities. Because of its greater range, AM remained more common in rural environments.
[edit]Pirate radio
Main article: Pirate radio
Pirate radio is radio broadcasting not sanctioned by the regulations of the originating country. Pirate radio may be a commercial enterprise supported by advertising targeted to listeners in the reception area, or may be privately run for entertainment, or political reasons, sometimes on a very small scale covering only a few city blocks.
[edit]Terrestrial digital radio
Digital radio broadcasting has emerged, first in Europe (the UK in 1995 and Germany in 1999), and later in the United States, France, the Netherlands, South Africa and many other countries worldwide. The most simple system is named DAB Digital Radio, for Digital Audio Broadcasting, and uses the public domain EUREKA 147 (Band III) system. DAB is used mainly in the UK and South Africa. Germany and Holland use the DAB and DAB+ systems, and France use the L-Band system of DAB Digital Radio.
In the United States digital radio isn't used in the same way as Europe and South Africa. Instead, the IBOC system is named HD Radio and owned by a consortium of private companies that is called iBiquity. An international non-profit consortium Digital Radio Mondiale (DRM), has introduced the public domain DRM system.
[edit]Satellite
This section requires expansion.
Satellite radio broadcasters are slowly emerging, but the enormous entry costs of space-based satellite transmitters, and restrictions on available radio spectrum licenses has restricted growth of this market. In the USA and Canada, just two services, XM Satellite Radio and Sirius Satellite Radio exist. Both XM and Sirius are owned by Sirius XM Radio, which was formed by the merger of XM and Sirius on July 29, 2008, whereas in Canada, XM Radio Canada and Sirius Canada remain separate companies.
[edit]Program formats

Main article: Radio format
Radio program formats differ by country, regulation and markets. For instance, the U.S. Federal Communications Commission designates the 88–92 megahertz band in the U.S. for non-profit or educational programming, with advertising prohibited.
In addition, formats change in popularity as time passes and technology improves. Early radio equipment only allowed program material to be broadcast in real time, known as live broadcasting. As technology for sound recording improved, an increasing proportion of broadcast programming used pre-recorded material. A current trend is the automation of radio stations. Some stations now operate without direct human intervention by using entirely pre-recorded material sequenced by computer control

Thursday, January 20, 2011

operating system

operating system
प्रचालन तंत्र (अंग्रेज़ी:ऑपरेटिंग सिस्टम) साफ्टवेयर का समूह है जो कि आंकड़ों एवं निर्देश के संचरण को नियंत्रित करता है। यह हार्डवेयर एवं साफ्टवेयर के बीच सेतु का कार्य करता है और कंप्यूटर का सॉफ्टवेयर घटक होता है। इसी की सहायता से ही कंप्यूटर में स्थापित प्रोग्राम चलते हैं। ऑपरेटिंग सिस्टम कंप्यूटर का मेरुदंड होता है, जो इसके सॉफ्टवेयर व हार्डवेयर को नियंत्रण में रखता है। यह अनाधिकृत व्यक्ति को कंप्यूटर के गलत प्रयोग करने से रोकता है।[१] वह इसमें भी विभेद कर सकता हैं कि कौन सा निवेदन पूरा करना है और कौन सा नहीं, इसके साथ ही इनकी वरीयता भी ध्यान रखी जाती है। इसकी मदद से एक से ज्यादा सीपीयू में भी प्रोगाम चलाए जा सकते हैं। इसके अलावा संगणक संचिका को पुनः नाम देना, डायरेक्टरी की विषय सूची बदलना, डायरेक्टरी बदलना आदि कार्य भी प्रचालन तंत्र के द्वारा किए जाते है।[२] डॉस (DOS), यूनिक्स, विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम (३.१, ९५, ९८, २०००, एक्स पी, विस्ता, विंडोज ७) और लिनक्स आदि कुछ प्रमुख प्रचालन तंत्र हैं।[२]
विभिन्न प्रचालन तंत्रों में से कुछ हैं:लिनक्स, मैक ओएस एक्स, डॉस, आईबीएम ओएस/2 (IBM OS/2), यूनिक्स, विन्डोज सीई, विन्डोज 3.x, विन्डोज ९५, विन्डोज ९८, विन्डोज मिलेनियम, विन्डोज़ एनटी, विन्डोज २०००, विन्डोज़ एक्स पी, विन्डोज़ विस्टा, विन्डोज़ 7

प्रचालन तंत्र कंप्यूटर से जुड़े कई मौलिक कार्यों को संभालता है, जैसे की-बोर्ड से इनपुट लेना, डिस्प्ले स्क्रीन को आउटपुट भेजना, डाइरेक्टरी और संगणक संचिका को डिस्क में ट्रेक करना, इत्यादि। बड़े कंप्यूटरों में इसका काम और अधिक होता है।[१] वह इनमें लगातार यह जांच करता है कि एक ही समय पर कंप्यूटर में चलने वाले प्रोगामों, फाइलों और एक ही समय पर खुलने वाली साइटों में दोहराव न हो। आरंभिक दौर में यह मेनफ्रेम कंप्यूटरों पर बड़े कामों के लिए ही हुआ करता था। बाद में धीरे-धीरे माइक्रोकम्प्यूटर्स में भी मिलने लगा, लेकिन उस समय इसमें एक समय पर केवल एक ही प्रोगाम रन करा सकते थे। मेनफ्रेम कंप्यूटर में १९६० में पहली बार बहुकार्यिक (मल्टीटास्किंग) सिस्टम आया था। इससे एक समय में एक से ज्यादा उपयोक्ता काम कर सकते थे। १९७० लिनक्स ने पहली बार पीडीपी-७ में प्रचालन तंत्र निकाला, जो मुख्यतया मल्टीटास्किंग, स्मृति प्रबंधन (मेमोरी मैनेजमेंट), स्मृति संरक्षण (मेमोरी प्रोटेक्शन) जैसे कार्य करता था।





ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है


ऑपरेटिंग सिस्टम एक सिस्टम सॉफ्टवेयर है, जो कम्प्यूटर सिस्टम के हार्डवेयर रिसोर्सेस, जैसे-मैमोरी, प्रोसेसर तथा इनपुट-आउटपुट डिवाइसेस को व्यवस्थित करता है । ऑपरेटिंग सिस्टम व्यवस्थित रूप से जमे हुए साफ्टवेयर का समूह है जो कि आंकडो एवं निर्देश के संचरण को नियंत्रित करता है । ऑपरेटिंग सिस्टम, कम्प्यूटर सिस्टम के प्रत्येक रिसोर्स की स्थिति का लेखा - जोखा रखता है तथा यह निर्णय भी लेता है कि किसका कब और कितनी देर के लिए कम्प्यूटर रिसोर्स पर नियंत्रण होगा । एक कम्प्यूटर सिस्टम के मुख्य रूप से चार घटक हैं -
* हार्डवेयर
* ऑपरेटिंग सिस्टम
* एप्लीकेशन प्रोग्राम
* यूजर्स

आपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता
आपरेटिंग सिस्टम हार्डवेयर एवंसाफ्टवेयर के बिच सेतु का कार्य करता है कम्पयुटर का अपने आप मे कोई अस्तित्व नही है । यङ केवल हार्डवेयर जैसे की-बोर्ड, मानिटर , सी.पी.यू इत्यादि का समूह है आपरेटिंग सिस्टम समस्त हार्डवेयर के बिच सम्बंध स्थापित करता है आपरेटिंग सिस्टम के कारण ही प्रयोगकर्ता को कम्युटर के विभिन्न भागो की जानकारी रखने की जरूरत नही पडती है साथ ही प्रयोगकर्ता अपने सभी कार्य तनाव रहित होकर कर सकता है यह सिस्टम के साधनो को बाॅटता एवं व्यवस्थित करता है

आपरेटिंग सिस्टम के कई अन्य उपयोगी विभाग होते है जिनके सुपुर्द कई काम केन्द्रिय प्रोसेसर द्वारा किए जाते है । उदाहरण के लिए प्रिटिंग का कोई किया जाता है तो केन्द्रिय प्रोसेसर आवश्यक आदेश देकर वह कार्य आपरेटिंग सिस्टम पर छोड देता है । और वह स्वयं अगला कार्य करने लगता है । इसके अतिरिक्त फाइल को पुनः नाम देना , डायरेक्टरी की विषय सूचि बदलना , डायरेक्टरी बदलना आदि कार्य आपरेटिंग सिस्टम के द्वारा किए जाते है ।
इसके अन्तर्गत निम्न कार्य आते है -

1) फाइल पद्धति
फाइल बनाना, मिटाना एवं फाइल एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना । फाइल निर्देशिका को व्यवस्थित करना ।

2) प्रक्रिया
प्रोग्राम एवं आंकडो को मेमोरी मे बाटना । एवं प्रोसेस का प्रारंभ एवं समानयन करना । प्रयोगकर्ता मध्यस्थ फाइल की प्रतिलिपी ,निर्देशिका , इत्यादि के लिए निर्देश , रेखाचित्रिय डिस्क टाप आदि

3) इनपुट/आउटपुट
माॅनिटर प्रिंटर डिस्क आदि के लिए मध्यस्थ

Saturday, January 15, 2011

अर्थशास्त्र

अर्थशास्त्र
यह पृष्ठ अर्थशास्त्र विषय से संबन्धित है। कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र ग्रन्थ के लिये यहां देखें।
अर्थशास्त्र (Economics) सामाजिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग का अध्ययन किया जाता है। अर्थशास्त्र शब्द संस्कृत शब्दों अर्थ( धन ) और शास्त्र की सन्धि से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है धन का अध्ययन।
लियोनेल रोबिंसन के अनुसार आधुनिक अर्थशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार है,"वह विज्ञान जो मानव स्वभाव का वैकल्पिक उपयोगों वाले सीमित साधनों और उनके प्रयोग के मध्य अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता है।" दुर्लभता का अर्थ है कि उपलब्ध संसाधन सभी मांगों और जरुरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं। दुर्लभता और संसाधनों के वैकल्पिक उपयोगों के कारण ही अर्थशास्त्र की प्रासंगिकता है। अतएव यह विषय प्रेरकों और संसाधनों के प्रभाव में विकल्प का अध्ययन करता है।
अनुक्रम [छुपाएँ]
१ वर्गीकरण
२ इतिहास
३ विषयवस्तु
४ मूल अवधारणायें
४.१ मूल्य
४.२ माँग और आपूर्ति
४.३ मूल्य
५ इन्हें भी देखें
६ संदर्भ
७ बाहरी कड़ियाँ
[संपादित करें]वर्गीकरण

व्यष्टि अर्थशास्त्र एवं समष्टि अर्थशास्त्र (Microeconomics and Macroeconomics)
सकारात्मक अर्थशास्त्र (जो हो रहा है) एवं मानक अर्थशास्त्र (जो होना चाहिए )
मुख्यधारा अर्थशास्त्र एवं अपारम्परिक अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र का प्रयोग यह समझने के लिये भी किया जाता है कि अर्थव्यवस्था किस तरह से कार्य करती है और समाज में विभिन्न वर्गों का आर्थिक सम्बन्ध कैसा है । अर्थशास्त्रीय विवेचना का प्रयोग समाज से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है, जैसे:- अपराध, शिक्षा, परिवार, स्वास्थ्य , कानून, राजनीति, धर्म, सामाजिक संस्थान और युद्ध इत्यदि।[१]
[संपादित करें]इतिहास

अर्थशास्त्र पर लिखी गयी प्रथम पुस्तक कौटिल्य रचित अर्थशास्त्र है। यद्यपि उत्पादन और वितरण के बारे में परिचर्चा का एक लम्बा इतिहास है, किन्तु आधुनिक अर्थशास्त्र का जन्म एडम स्मिथ की किताब द वेल्थ आफ़ नेशन्स के 1776 में प्रकाशन के समय से माना जाता है।
[संपादित करें]विषयवस्तु

अर्थशास्त्र को कई प्रकारों से विभाजित किया जा सकता है, किन्तु किसी अर्थव्यवस्था का निम्नलिखित दो तरीकों से विश्लेषण किया जाता है।
व्यष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत व्यक्तिगत इकाइयों (जिनमें व्यापार एवं परिवार शामिल हैं ) और सीमित बाजार में उनके अन्तःसम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।
समष्टि अर्थशास्त्र अन्तर्गत समूचे देश की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत सकल घरेलू उत्पाद, रोजगार, मुद्रास्फीति, उपभोग,निवेश जैसी राशियों का अध्ययन किया जाता है।

[संपादित करें]मूल अवधारणायें

[संपादित करें]मूल्य
मूल्य की अवधारणा अर्थशास्त्र में केन्द्रीय है। इसको मापने का एक तरीका वस्तु का बाजार भाव है। एडम स्मिथ ने श्रम को मूल्य के मुख्य श्रोत के रुप में परिभाषित किया। "मूल्य के श्रम सिद्धान्त" को कार्ल मार्क्स सहित कई अर्थशास्त्रियों ने प्रतिपादित किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी सेवा या वस्तु का मूल्य उसके उत्पादन में प्रयुक्त श्रम के बराबर होत है। अधिकांश लोगों का मानना है कि इसका मूल्य वस्तु के दाम निर्धारित करता है। दाम का यह श्रम सिद्धान्त "मूल्य के उत्पादन लागत सिद्धान्त" से निकटता से जुड़ा हुआ है।
[संपादित करें]माँग और आपूर्ति
प्रारुप बताता है कि किस तरह आपूर्ति और मॉग के सन्तुलन से कीमत में परिवर्तन होता है।
में माँग और आपूर्ति की सहायता से पूर्णतः प्रतिस्पर्धी बाजार में बेचे गये वस्तुओं कीमत और मात्रा की विवेचना , व्याख्या और पुर्वानुमान लगाया जाता है। यह अर्थशास्त्र के सबसे मुलभूत प्रारुपों में से एक है। क्रमश: बड़े सिद्धान्तों और प्रारूपों के विकास के लिए इसका विशद रुप से प्रयोग होता है।
माँग किसी नियत समयकाल में किसी उत्पाद की वह मात्रा है, जिसे नियत दाम पर उपभोक्ता खरीदना चाहता है और खरीदने में सक्षम है।माँग को सामान्यतः एक तालिका या ग्राफ़ के रुप में प्रदर्शित करते हैं जिसमें कीमत और इच्छित मात्रा का संबन्ध दिखाया जाता है।
आपूर्ति वस्तु की वह मात्रा है जिसे नियत समय में दिये गये दाम पर उत्पादक या विक्रेता बाजार में बेचने के लिए तैयार है। आपूर्ति को सामान्यतः एक तालिका या ग्राफ़ के रुप में प्रदर्शित करते हैं जिसमें कीमत और आपूर्ति की मात्रा का संबन्ध दिखाया जाता है।
[संपादित करें]मूल्य
किसी वस्तु की कीमत किसी बाजार में ग्राहक और विक्रेता के बीच उसकी विनिमय की दर है।
[संपादित करें]

पटकथा-लेखन

सारांश:


पटकथा-लेखन एक हुनर है। अंग्रेजी में पटकथा-लेखन के बारे में पचासों किताबें उपलब्ध हैं और विदेशों के खासकर अमेरिका के, कई विश्वविद्यालयों में पटकथा-लेखन के बाक़ायदा पाठ्यक्रम चलते हैं। लेकिन भारत में इस दिशा में अभी तक कोई पहल नहीं हुई। हिन्दी में तो पटकथा-लेखन और सिनेमा से जुड़ी अन्य विद्याओं के बारे में कोई अच्छी किताब छपी ही नहीं है। इसकी एक वजह यह भी है कि हिन्दी में सामान्यतः यह माना जाता रहा है कि लिखना चाहे किसी भी तरह का हो, उसे सिखाया नहीं जा सकता। कई बार तो लगता है कि शायद हम मानते हैं कि लिखना सीखना भी नहीं चाहिए। यह मान्यता भ्रामक है और इसी का नतीजा है कि हिन्दी वाले गीत-लेखन, रेडियो, रंगमंच, सिनेमा, टी.वी. और विज्ञापनों आदि में ज़्यादा नहीं चल पाए।
लेकिन इधर फिल्म और टी.वी के प्रसार और पटकथा-लेखन में रोजगार की बढ़ती सम्भावनाओं को देखते हुए अनेक लोग पटकथा-लेखन में रुचि लेने लगे हैं, और पटकथा के शिल्प की आधारभूत जानकारी चाहते हैं। अफसोस कि हिन्दी में ऐसी जानकारी देने वाली पुस्तक अब तक उपलब्ध ही नहीं थी।
‘पटकथा-लेखन : एक परिचय’ इसी दिशा में एक बड़ी शुरुआत है, न सिर्फ इसलिए कि इसके लेखक सिद्ध पटकथाकार मनोहर श्याम जोशी हैं, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने इस पुस्तक की एक-एक पंक्ति लिखते हुए उस पाठक को ध्यान में रखा है जो फिल्म और टी.वी में होने वाले लेखन का क, ख ग, भी नहीं जानता। प्राथमिक स्तर की जानकारियों से शुरू करके यह पुस्तक हमें पटकथा लेखन और फिल्म व टी.वी की अनेक माध्यमगत विशेषताओं तक पहुँचाती हैं, और सो भी इतनी दिलचस्प और जीवन्त शैली में कि पुस्तक पढ़ने के बाद आप स्वतः ही पटकथा पर हाथ आजमाने की सोचने लगते हैं।


1
देखने-सुनने की चीज है सिनेमा



कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि जिसे लिखना आता है वह कुछ भी लिख सकता है। लेकिन यह सच नहीं है। हर विधा की, हर माध्यम की अपनी अलग-अलग विशेषताएं होती हैं और उनके लिए लिख सकने के लिए अलग-अलग तरह की योग्यताएँ दरकार होती हैं। उदाहरण के लिए, पत्रकार से यह आशा की जाती है कि यथार्थ का कम-से-कम शब्दों में ज्यों-का-त्यों वर्णन करेगा और अपनी कल्पना से कोई काम नहीं लेगा। दूसरी ओर कहानीकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी कल्पना के सहारे यथार्थ को एक यादगार रंग देकर साहित्य के स्तर पर पहुंचा देगा।

साहित्य में यह सुविधा है कि शब्दों के सहारे किसी भी चीज का वर्णन किया जा सकता है और कैसी भी भावना उभारी जा सकती है। कोई पात्र क्या याद कर रहा है ? क्या सपने देख रहा है ? उसकी परिस्थिति क्या है ? मन:स्थिति क्या है ? अन्य पात्रों से उसके सम्बन्ध कैसे हैं ? उनके बारे में वह क्या सोचता है ? पात्रों की आपसी टकराहट से कब, कहाँ, क्या हो रहा है ? इस सबका शब्दों द्वारा वर्णन किया जा सकता है। लिखित साहित्य में एक अतिरिक्त सुविधा यह प्राप्त है कि अगर पाठक को कोई बात पहली बार पढकर समझ में न आए तो वह उसे फिर-फिर पढ़ सकता है।


वाचिक साहित्य, श्रव्य माध्यम


वाचिक (बोलकर सुनाए जानेवाले) साहित्य में श्रोता को यह सुविधा प्राप्त नहीं है। व्यास गद्दी पर विराजमान कथावाचक को श्रोता बार-बार नहीं टोक सकते कि हम समझ नहीं पाए, कृपया दुबारा कहें। इसलिए वाचिक साहित्य में बात को सरल शब्दों और वाक्यों में कहना होता है। यादगार और चुभती हुई बनाकर कहना होता है। मंच से गा-बोलकर सुनाए जाने वाले साहित्य में कलाकार कठिन प्रसंगों को दुहराने की या स्वयं ही ‘अर्थात्’ या ‘क्या कहा’ जैसे प्रश्न उठाकर खुलासा करने की युक्ति भी अपनाते हैं। लोक-नाटक ‘सांग’ में जब किसी हिंदी-उर्दू-गीत में कोई कठिन पंक्ति आती है तब संचालक सम्बद्ध पात्र से पूछता है कि उस पंक्ति का क्या मतलब है-यथा-‘‘अरी गुल बकावली, तू दो लम्बर पर के बोली ?’’ और फिर वह पात्र ठेठ हरियाणवी गद्य में पंक्ति विशेष का अर्थ बताता/बताती है।

वाचिक साहित्य के आधुनिक माध्यम रेडियो से नाटक प्रस्तुत करते हुए दोहराने-समझाने की ऐसी कोई गुंजाइश नहीं होती। यही नहीं, श्रोता बोलनेवाले को केवल सुनता है, देखता नहीं कि उसके चेहरे के भाव पढ़ सके। इस दृष्टि से रेडियो खालिस श्रव्य माध्यम है। इसके लिए ऐसा लेखक दरकार है जो सारा कथानक पात्रों की आपसी बातचीत और साउंड इफैक्ट यानी ध्वनि-प्रभाव के सहारे उजागर कर सके। फर्ज कीजिए कि दृश्य यह हो कि नायक-नायिका घोड़े पर सवार होकर अपना पीछा करते नायिका के घुड़सवार भाइयों से बचते हुए नाटक के गाँव की ओर बढ़ रहे हैं जो फिरोजा नदी के पार है, तो घोड़ों की टापों के ध्वनि-प्रभाव से और नायक-नायिका और भाइयों की आपसी बातचीत से पीछा किए जाने की स्थिति स्पष्ट करनी होगी और फिर नदी की कल-कल के ध्वनि-प्रभाव और नायक के संवाद से स्पष्ट करना होगा कि वह फिरोजा नदी आ गई है, जिसके पार उसका गाँव है।

साहित्य पढ़ने से ताल्लुक रखता है तो रेडियो सुनने से। उधर फिल्म और टी.वी. ऐसे माध्यम हैं जिनमें हम एक साथ देखते भी हैं, सुनते भी हैं, और पर्दे पर लिखा हुआ पढ़ भी सकते हैं। फिल्म और टी.वी. में हम घटनाओं को होता हुआ देखते हैं और पात्रों को बोलता हुआ सुनते हैं। इसीलिए इन्हें ऑडियो-विजुअल यानी दृश्य-श्रव्य माध्यम कहते हैं। यहाँ यह पूछा जा सकता है कि रंगमंच में भी तो हम घटनाओं को होता हुआ और पात्रों को बोलता हुआ सुनते हैं; तो फिर रंगमंच को ऑडियो-विजुअल क्यों नहीं कहते ? इसका जवाब यह है कि रंगमंच के लिए लिखा गया नाटक तो ‘साहित्य’ की श्रेणी में आता है क्योंकि उसमें सारी बात संवादों यानी शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है। यह नाटक दर्शकों के सामने अभिनेताओं द्वारा खेला जाता है इसीलिए उसकी प्रस्तुति प्रदर्शन-कलाओं के अन्तर्गत आती है।


सिनेमा और नाटक


आप आपत्ति कर सकते हैं कि फिल्म और टी.वी. के लिए भी पटकथा लिखी जाती है और उसे डायरेक्टर यानी दिग्दर्शक के निर्देशन में ठीक उसी तरह खेला जाता है जैसे मंच पर। यह सवाल उठाना तीन बातों को भूल जाना है। पहली यह कि फिल्म और टी.वी. में रंगमंच की तरह नाटक दर्शकों के नहीं, एक कैमरे के सामने खेला जाता है। दूसरी यह कि जो एक बार खेल दिया जाता है वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि दर्शकों के प्रतिनिधि बने हुए कैमरों पर रंगमंच के दर्शक की तरह यह रोक नहीं होती कि वह अपनी ही सीट पर बैठकर तमाशा देखें, मंच पर न चढ़ आएँ। रंगशाला में आगे से आगे वाली सीट पर बैठे हुए दर्शकों और मंच पर खड़े पात्रों के बीच भी हमेशा एक दूरी बनी रहती है। सिनेमाघर में बैठे दर्शक के लिए कैमरा यह दूरी मिटा देता है। यही नहीं, कैमरा अपनी सीट पर ही बैठे दर्शक को पात्रों से चाहे जितनी दूरी पर भी, चाहे जितना ऊपर-नीचे ले जा सकता है।

कैमरा आगे-पीछे कहीं भी कितनी भी दूरी पर रखा जा सकता है। पास से दूर ले जाया जा सकता है और दूर से पास लाया जा सकता है। उसे ऊपर-नीचे ले जाया जा सकता है; अपनी धुरी पर घुमाया जा सकता है। पात्रों के सिर के ऊपर की ओर देखता हुआ रखा जा सकता है तो पात्रों के कदमों से भी नीचे से ऊपर की ओर देखता हुआ रखा जा सकता है। उसे समुद्र की गहराई में ले जाया जा सकता है और पर्वत की ऊंचाई पर भी। गोया कैमरा आजाद और बेढब करतब करके सब कुछ देख लेने को तैयार दर्शक बन जाता है। कैमरा दर्शक का नुमाइंदा बनकर किसी भी पात्र या वस्तु के नजदीक जा सकता है। वह किसी पात्र के चेहरे की छोटी-से-छोटी भाव-भंगिमा, उसके बदन का कोई छोटे-से-छोटे हिस्सा, कोई छोटी-से-छोटी वस्तु या उसका हिस्सा और किसी स्थल का छोटे-से-छोटा ब्यौरा दिखा सकता है। साथ ही वह चीजों को इतना बड़ा करके दिखा सकता है जितना कि पास आकर भी आँख से नहीं देखा जा सकता।

रंगमंच में यह सीमा भी होती है कि उसमें बहुत बड़ी-बड़ी चीजें नहीं दिखाई जा सकतीं। भव्य-से-भव्य मंच पर पानीपत की लड़ाई या एवरेस्ट विजय या सागर में टाइटैनिक जहाज का डूबना जैसे दृश्य नहीं दिखाए जा सकते। उधर कैमरा जैसे छोटी-से-छोटी चीज को दिखा सकता है, वैसे ही बड़ी-से-बड़ी चीज को भी। रंगमंच में सीमित ही सैट लग सकते हैं इसलिए सीमित ही घटना-स्थल रखे जा सकते हैं। उतना ही दिखाया जा सकता है जितना उन सैटों में हो सकता है। फिल्म और टी.वी. में ऐसी कोई सीमा नहीं है। आप चाहे जितने सैट बना सकते हैं और चाहे जितने बाहरी लोकेशनों पर जा सकते हैं। पात्रों को ले जाइए, कैमरा ले जाइए और लोकेशन पर शूट कर लाइए और फिर सबको जोड़कर दिखा दीजिए। एक तरफ से दर्शक के लिए फिल्म की खासियत ही यह बन जाती है कि उसमें घटना-स्थल बड़ी तेजी से बदलता रहता है।


बिम्ब बोलेंगे, हम नहीं


जहाँ रंगमंच के मुकाबले फिल्म में ये तमाम सुविधाएँ थीं, वहीं शुरू में उतनी ही बड़ी एक असुविधा भी थी कि चित्र के साथ ध्वनि अंकित नहीं की जा सकती थी। गोया सिनेमा गूँगा था। इस असुविधा ने एक नई भाषा को जन्म दिया जिसमें तस्वीरें ही खुद बोलती थीं। चित्रों के सहारे कहानी कह देने की यह कला कैमरे के पास-दूर, इधर-उधर जा सकने से मिलनेवाले तरह-तरह के चित्रों और इस तरह खींचे हुए चित्रों को उनमें सम्बन्ध पैदा करनेवाले क्रम से जोड़ने की युक्ति से विकसित हुई। मूकपट के दौर में दिग्दर्शकों ने इस कला में इतनी महारत हासिल कर ली कि बगैर संवाद सुने भी ज्यादातर कहानी दर्शकों की समझ में आने लगी। जहां बहुत ही जरूरी हुआ केवल वहीं संवाद को कार्ड में लिखकर फिल्मा लिया गया और पात्र के ओंठ खुलने के बाद दिखा दिया गया। बोलते बिम्बों का कमाल कुछ वर्षों पहले कमल हसन की मूक फिल्म ‘पुष्पक’ में देखा गया। उसमें तो कहीं कोई संवाद का कार्ड तक न था।

जब चित्र के साथ-साथ ध्वनि भी अंकित की जाने लगी तब मूकपट ने बोलचाल का रूप ले लिया। इससे संवादों का महत्त्व बढ़ा लेकिन इतना भी नहीं कि रंगमंच की तरह सारी बात संवादों के माध्यम से कही जाने लगे। कोई नाटक खेला और कैमरा दर्शक की तरह रखकर उसे दर्शा दिया ! मूकपट दर्शकों को बिम्बों की सशक्त भाषा का इतना आदी कर चुका था कि इस तरह से फिल्माया गया नाटक उन्हें बिलकुल बेजान लगता। इसीलिए बिम्बों का महत्त्व बना रहा और संवाद फिल्मों पर पूरी तरह हावी न हो सके। हां, नाटकों से इन नए माध्यमों ने ‘नाटकीयता की पकड़’ और ‘तीन अंकों वाला ढाँचा’ जरूर ज्यों-का-त्यों उधार ले लिया।

फिल्म और टेलीविजन में बिम्बों की भाषा और पात्रों के संवाद, दोनों का कहानी कहने में बड़ा महत्त्व है। लेकिन फिल्म और टेलीविजन में एक बड़ा अंतर यह है कि टेली-नायक में संवादों का महत्त्व लगभग उतना ही हो जाता है जितना नाटक में। इसकी वजह यह है कि टेलीविजन का पर्दा सिनेमा के पर्दे के मुकाबले में बहुत छोटा होता है उसमें कैमरा को बहुत दूर ले जाने से खास कुछ दिखता नहीं। इललिए ज्यादातर पात्रों के बोलते हुए चेहरे ही फिल्माए जाते हैं। गोया बिम्बों में ज्यादा विविधता नहीं रह पाती। दूसरी वजह यह है कि इस छोटे से पर्दे पर आते बिम्बों को दर्शक किसी बंद अँधेरे हॉल में नहीं, अपने घर के किसी रौशन कमरे में बैठे हुए देखते हैं। इसलिए उनकी आँखें पर्दे पर एकटक नहीं जमी रह पातीं। अगर पात्र चुप हो जाएँ तो ध्यान पर्दे से हट जाता है। फिर टेली-नाटकों के सीमित बजट में लोकेशनों पर जाना या बहुत ज्यादा सैट बनवाना सम्भव नहीं होता। रंगमंच की तरह उनमें भी कुछ ही सैटों में काम चलाना पड़ता है। इसलिए संवादों का महत्त्व बढ़ जाता है।


ऑडियो-विजुअल इमेजिनेशन


सिनेमा और टेलीविजन की विभिन्नता की बात बाद में विस्तार से की जा सकती है। अभी तो उनकी समानता की ओर ध्यान दिलाना है कि दोनों ही दृश्य-श्रव्ये माध्यम है। इनमें घटनाओं को होता हुआ दिखाया जाता है और पात्रों को बोलता हुआ। तो इस माध्यम के लिए लिखनेवाला व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो दृश्य-श्रव्य कल्पना का धनी हो। दृश्य-श्रव्य कल्पना उर्फ ‘ऑडियो-विजुअल इमेजिनेशन’ का अर्थ है अपने मानस-पटल पर घटनाओं को घटता हुआ देख सकना और पात्रों को आपस में संवाद करते हुए सुन सकना। ऐसा तभी हो सकता है जब आपका दिमाग भी फिल्म कैमरे की तरह काम करता हो और घटना और संवादों का ब्यौरा दर्ज करता रहता हो। यानी आप दृश्य-श्रव्य स्मृति के धनी हों।

यह मेरा सौभाग्य था कि मेरे साहित्यिक गुरु अमृतलालजी नागर यानी आप दृश्य-श्रव्य के धनी हो, की दृश्य-श्रव्य कल्पना अद्भुत थी। जब मैं लखनऊ में उनका चेला बना तब नागरजी सिनेमा जगत से साहित्य में लौटे थे। नागरजी को पहला ड्राफ्ट बोलकर शिष्यों से लिखवाने की आदत थी। यद्यपि वह सिनेमाघर से विरक्त होकर आए थे और हम शिष्यों को पटकथा लेखन सिखाने से साफ इनकार करते थे तथापि पटकथा लेखन की शैली का उन पर इतना गहरा असर था कि उनके बोले हुए ‘बूँद और समुद्र’ को कागज पर उतारना गोया पटकथा लेखन के बुनियादी तत्वों से परिचित होना था। पात्रों, परिस्थितियों और घटनाओं का सजीव वर्णन, पात्रों की पृष्ठभूमि और मन:स्थिति के अनुसार संवाद घटनाओं के माध्यम से चरित्र निरूपण और चरित्रों के घात-प्रतिघात से पैदा हुई घटनाएँ-पटकथा के ये तमाम नुस्खे मुझे नागरजी की वृत्तांत शैली में मिले। भगवतीचरण वर्मा के उपन्यासों में भी आप पटकथा का प्रभाव देख सकते हैं। वह भी बॉलीवुड में रह चुके थे।

द्रष्टव्य है कि नागरजी और भगवती बाबू दोनों ही बेहतरीन किस्सागो थे। घटनाओं का रस लेते हुए और रस देते हुए सजीव वर्णन करनेवाली किस्सागोई दृश्य-श्रव्य कल्पना की उपज होती है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग न सिर्फ ब्यौरेवार यह बता पाते हैं कि क्या हुआ, बल्कि यह भी सुनाते जाते हैं कि किसने कब क्या कहा ? कौन कैसा था ? क्या पहने हुए था ? आदि-आदि। ऐसे लोग दृश्य-श्रव्य स्मृति के धनी होते हैं। मेरी बहन इंटर की प्राइवेट परीक्षा देने के लिए मुरादनगर में एक हफ्ता बिताकर जब लौटी तब उसने महीनों तक वहाँ के किस्से सुना-सुनाकर हमारा मनोरंजन किया। ठीक तीस साल बाद जब उसकी छोटी बेटी दो साल अमेरिका में रहकर लौटी तब उसके अमेरिका प्रवास की सारी कहानी 20-25 मिनट में खत्म हो गई। मेरी भांजी मास कॉम की छात्रा होने के नाते पटकथा लेखन की जानकारी रखती है पर उसमें दृश्य-श्रव्य स्मृति का अभाव है। उधर मेरी बहन भरपूर दृश्य-श्रव्य-स्मृति और कल्पना की धनी है।


किस्सागो, बनिए


अफसोस, पेशेवर किस्सागो अब नहीं रहे ! वरना मैं आपसे कहता कि दृश्य-श्रव्य कल्पना का कमाल देखना हो तो उनकी किस्सागोई का आनंद लेने जाए। वे न सिर्फ यह बताते थे कि किस क्रम से क्या-क्या कहा। बल्किन नकलें उतार-उतार कर यह भी थे किसने किस अंदाज में क्या-क्या कहा। बल्कि वह पात्रों की मन:स्थिति और प्रतिक्रियाओं का भी आभास देते जाते थे-कुछ अपने शब्दों से और कुछ अपने अभिनय से। इस तरह से सारी घटना को उसकी पूरी नाटकीयता के साथ श्रोता के लिए उजागर कर देते। अगर कहीं कोई पेशेवर किस्सागो अब भी हो तो उसे जरूर सुनें। नहीं तो मेरी बहन सरीखे जो गैर-पेशेवर किस्सागो आपकी जानकारी में हों उनकी बातों का रस लें। लोकमंच की कुछ विधाओं में और धार्मिक प्रवचनों में आज भी जबरदस्त किस्सागोई की बानगी आपको मिल सकती है।

हाल में मैंने व्यास गद्दी पर बैठे एक कथावाचक को महाभारत का एक प्रसंग इस तरह प्रस्तुत करते हुए सुना-‘‘वहां पहुंचकर अर्जुन क्या देखता है कि भगवान श्रीकृष्ण शयन कर रहे हैं और दुर्योधन सिरहाने खड़ा है। दुर्योधन को वहां देखकर अर्जुन झटका खा जाता है कि अरे, ये तो मुझसे भी पहले पहुँच गए। खैर वह जाकर श्रीकृष्ण भगवान के पैताने बैठकर प्रभु के श्रीचरण दबाने लगता है। थोड़ी देर में प्रभु की आँख खुलती हैं। उन्हें पैताने बैठा अर्जुन पहले नजर आता है। प्रभु पूछते हैं बताओं, किस कारण आए ? अर्जुन हाथ जोड़कर निवेदन करता है कि मैं युद्ध में आपकी सहायता लेने आया हूँ। तब दुर्योधन बात को बीच में काटकर कहता है कि सहायता के लिए इससे पहले मैं आया हूँ, पहले मेरी बात सुनी जाए। प्रभु उठ बैठते है और मुसकराकर कहते हैं कि आए तुम जरूर पहले होगे मगर पैताने बैठा अर्जुन मुझे पहले नजर आया। दुर्योधन आपत्ति करता है कि यह अन्याय वाली बात होगी। प्रभु फिर मुसकराते हैं और कहते हैं कि देखो, मैं पूरा न्याय करूँगा-दोनों को सहायता देकर। तुममे से एक व्यक्ति मेरी सारी सेनाएँ ले लो और दूसरा सिर्फ मुझे। श्रीकृष्ण भगवान पहले अर्जुन को पूछतें हैं, तुम्हें क्या चाहिए ? दुर्योधन का चेहरा चिंता से खिंच जाता है कि अब यह सारी सेना माँग लेगा। लेकिन श्रीकृष्ण भक्त अर्जुन कहता है मुझे आप चाहिएं प्रभु, आपकी सेनाएँ नहीं। और मूर्ख दुर्योधन इसे अर्जुन की मूर्खता समझकर खुश होता है।’’
अगले परिच्छेद में आप देखेंगे कि कथावाचक की यह शैली ही पटकथा लेखन की शैली है।


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पटकथा क्या बला है ?



तो मैं कह रहा था कि कथावाचक और किस्सागो अक्सर पटकथा की शैली अपनाते हैं। यह पटकथा की शैली क्या है और कहानी कहने के आम ढंग से वह किस तरह अलग हैं, यह जानने के लिए कोई पटकथा पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। फिल्म देखकर आए हुए किसी भी व्यक्ति से फिल्म की कहानी सुन लीजिए, बात साफ हो जाएगी।

एक बार मैने ‘दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे’ देखकर आई अपनी भतीजी से उस फिल्म की कहानी पूछी तो उसने कुछ इस तरह कहा-काजोल लंदन में दुकान खोले हुए कठोर अमरीशपुरी और सदय फरीदा जलाल की बेटी होती है। हालाँकि काजोल लंदन में पली-बढ़ी होती है। अमरीशपुरी उस पर अपने भारतीय गाँव से मिले हुए संस्कार थोपता रहता है। काजोल बेचारी उससे बहुत डरती है। अमरीशपुरी उसका ब्याह बचपन में ही भारत में अपने दोस्त के बेटे से तय कर चुका होता है। काजोल को यह बात बेतुकी लगती है, पर वह बाप से कुछ नहीं कह पाती। शाहरूख खान मस्तमौला विधुर अनुपम खेर का बेटा होता है। बाप-बेटा दोनों दोस्त-जैसे होते हैं। एक रात शाहरूख खान जरूरी दवा खरीदने के बहाने अमरीशपुरी की बंद दुकान खुलवा देता है और बीयर ले जाता है। इससे अमरीशपुरी को शाहरूख खान बहुत घटिया लड़का लगता है। उधर फरीदा जलाल अपने पति से चिरौरी करके बेटी को भारत लौटने से पहले सहेलियों के साथ यूरोप यात्रा पर जाने की इजाजत देती है। वहीं उसकी मुलाकात शाहरूख खान से होती है। तकरार के बाद दोनों में प्यार हो जाता है। लंदन लौटने पर अमरीशपुरी को इस बात का पता चलता है और वह काजोल को लेकर पंजाब चल देता है, सादी करवाने।’’

आप गौर करेगे कि यह काहनी कहने का सामान्य ढंग नहीं है। आमतौर से तो कहानियाँ ‘एक था राजा’ वाली शैली में लिखी जाती हैं। उसे कहने या लिखनेवाला एक ऐसी घटना बयान कर रहा होता जो अतीत में घट चुकी है। इसलिए वह भूतकालीन क्रियापदों का उपयोग करता है-‘‘एक राजा था जो अपनी रानी से बहुत प्यार करता था। लेकिन उसे इस बात का बहुत दुख था कि रानी को कोई संतान न थी।’’

इस हिसाब से तो मेरी भतीजी को कहानी कुछ इस तरह सुनानी चाहिए थी-‘लंदन नगर का भारतीय दुकानदार अमरीशपुरी रूढ़िवादी विचारो का था इसलिए अपनी बेटी काजोल पर कड़ा अंकुश रखता था। काजोल जितना ही उससे डरती थी उतना ही अपनी दयालु माँ फरीदा जलाल से प्यार करती थी। अमरीश चाहता था कि उसकी बेटी भारत में उसके दोस्त के बेटे से शादी करे। मगर काजोल उस शाहरूख खान को दिल दे बैठी थी जिसने उसके पिता को एक दिन नाराज कर दिया था।’’ मगर मेरी भतीजी ने कहानी इस तरह नहीं सुनाई। और वह कोई अपवाद नहीं है। आप किसी से भी किसी फिल्म की कहानी, सुनें, वह मेरी भतीजी वाली शैली में सुनाएगा। कोई यह नहीं कहेगा कि ‘हीरो को गुस्सा आ गया’ या ‘हीरोइन ने जहर पी लिया’ आपको उससे यही सुनने को मिलेगा कि ‘हीरो गुस्सा हो जाता है’, ‘हीरोइन जहर पी लेती है।’ ऐसा इसलिए होता है कि दर्शक फिल्म में घटनाओं को होता हुआ और पात्रों को बोलता हुआ सुनता है। फिल्म में अतीत सतत नहीं, वर्तमान दर्शाया जाता है। इसलिए फिल्म की कहानी सुनाते हुए हम अनिश्चित वर्तमान काल के क्रियापदों का प्रयोग करने लगते हैं। एक राजा था की जगह हम कहते हैं, ‘एक राजा होता है।’

role of indian press

प्रेस आज जितना स्वतंत्र और मुखर दिखता है, आजादी की जंग में यह उतनी ही बंदिशों और पाबंदियों से बँधा हुआ था। न तो उसमें मनोरंजन का पुट था और न ही ये किसी की कमाई का जरिया ही। ये अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ आजादी के जाँबाजों का एक हथियार और माध्यम थे, जो उन्हें लोगों और घटनाओं से जोड़े रखता था। आजादी की लड़ाई का कोई भी ऐसा योद्धा नहीं था, जिसने अखबारों के जरिए अपनी बात कहने का प्रयास न किया हो। गाँधीजी ने भी ‘हरिजन’, ‘यंग-इंडिया’ के नाम से अखबारों का प्रकाशन किया था तो मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 'अल-हिलाल' पत्र का प्रकाशन। ऐसे और कितने ही उदाहरण हैं, जो यह साबित करते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं की आजादी की लड़ाई में महती भूमिका थी।

यह वह दौर था, जब लोगों के पास संवाद का कोई साधन नहीं था। उस पर भी अँग्रेजों के अत्याचारों के शिकार असहाय लोग चुपचाप सारे अत्याचर सहते थे। न तो कोई उनकी सुनने वाला था और न उनके दु:खों को हरने वाला। वो कहते भी तो किससे और कैसे? हर कोई तो उसी प्रताड़ना को झेल रहे थे। ऐसे में पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत ने लोगों को हिम्मत दी, उन्हें ढाँढस बँधाया। यही कारण था कि क्रांतिकारियों के एक-एक लेख जनता में नई स्फूर्ति और देशभक्ति का संचार करते थे। भारतेंदु का नाटक ‘भारत-दुर्दशा’ जब प्रकाशित हुआ था तो लोगों को यह अनुभव हुआ था कि भारत के लोग कैसे दौर से गुजर रहे हैं और अँग्रेजों की मंशा क्या है।


अखबार का इतिहास और योगदान: यूँ तो ब्रिटिश शासन के एक पूर्व अधिकारी के द्वारा अखबारों की शुरुआत मानी जाती है, लेकिन उसका स्वरूप अखबारों की तरह नहीं था। वह केवल एक पन्ने का सूचनात्मक पर्चा था। पूर्णरूपेण अखबार बंगाल से 'बंगाल-गजट' के नाम से वायसराय हिक्की द्वारा निकाला गया था। आरंभ में अँग्रेजों ने अपने फायदे के लिए अखबारों का इस्तेमाल किया, चूँकि सारे अखबार अँग्रेजी में ही निकल रहे थे, इसलिए बहुसंख्यक लोगों तक खबरें और सूचनाएँ पहुँच नहीं पाती थीं। जो खबरें बाहर निकलकर आती थीं। उन्हें काफी तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता था, ताकि अँग्रेजी सरकार के अत्याचारों की खबरें दबी रह जाएँ। अँग्रेज सिपाही किसी भी क्षेत्र में घुसकर मनमाना व्यवहार करते थे। लूट, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाएँ आम होती थीं। वो जिस भी क्षेत्र से गुजरते, वहाँ अपना आतंक फैलाते रहते थे। उनके खिलाफ न तो मुकदमे होते और न ही उन्हें कोई दंड ही दिया जाता था। इन नारकीय परिस्थितियों को झेलते हुए भी लोग खामोश थे। इस दौरान भारत में ‘द हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘नेशनल हेराल्ड', 'पायनियर', 'मुंबई-मिरर' जैसे अखबार अँग्रेजी में निकलते थे, जिसमें उन अत्याचारों का दूर-दूर तक उल्लेख नहीं रहता था। इन अँग्रेजी पत्रों के अतिरिक्त बंगला, उर्दू आदि में पत्रों का प्रकाशन तो होता रहा, लेकिन उसका दायरा सीमित था। उसे कोई बंगाली पढ़ने वाला या उर्दू जानने वाला ही समझ सकता था। ऐसे में पहली बार 30 मई, 1826 को हिन्दी का प्रथम पत्र ‘उदंत मार्तंड’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ।

यह पत्र साप्ताहिक था। ‘उदंत-मार्तंड' की शुरुआत ने भाषायी स्तर पर लोगों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। यह केवल एक पत्र नहीं था, बल्कि उन हजारों लोगों की जुबान था, जो अब तक खामोश और भयभीत थे। हिन्दी में पत्रों की शुरुआत से देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ और आजादी की जंग को भी एक नई दिशा मिली। अब लोगों तक देश के कोने-कोन में घट रही घटनाओं की जानकारी पहुँचने लगी। लेकिन कुछ ही समय बाद इस पत्र के संपादक जुगल किशोर को सहायता के अभाव में 11 दिसंबर, 1827 को पत्र बंद करना पड़ा। 10 मई, 1829 को बंगाल से हिन्दी अखबार 'बंगदूत' का प्रकाशन हुआ। यह पत्र भी लोगों की आवाज बना और उन्हें जोड़े रखने का माध्यम। इसके बाद जुलाई, 1854 में श्यामसुंदर सेन ने कलकत्ता से ‘समाचार सुधा वर्षण’ का प्रकाशन किया। उस दौरान जिन भी अखबारों ने अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई भी खबर या आलेख छपा, उसे उसकी कीमत चुकानी पड़ी। अखबारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता था। उसकी प्रतियाँ जलवाई जाती थीं, उसके प्रकाशकों, संपादकों, लेखकों को दंड दिया जाता था। उन पर भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता था, ताकि वो दुबारा फिर उठने की हिम्मत न जुटा पाएँ।


आजादी की लहर जिस तरह पूरे देश में फैल रही थी, अखबार भी अत्याचारों को सहकर और मुखर हो रहे थे। यही वजह थी कि बंगाल विभाजन के उपरांत हिन्दी पत्रों की आवाज और बुलंद हो गई। लोकमान्य तिलक ने 'केसरी' का संपादन किया और लाला लाजपत राय ने पंजाब से 'वंदे मातरम' पत्र निकाला। इन पत्रों ने युवाओं को आजादी की लड़ाई में अधिक-से-अधिक सहयोग देने का आह्वान किया। इन पत्रों ने आजादी पाने का एक जज्बा पैदा कर दिया। ‘केसरी’ को नागपुर से माधवराव सप्रे ने निकाला, लेकिन तिलक के उत्तेजक लेखों के कारण इस पत्र पर पाबंदी लगा दी गई।

उत्तर भारत में आजादी की जंग में जान फूँकने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से साप्ताहिक पत्र 'प्रताप' का प्रकाशन आरंभ किया। इसमें देश के हर हिस्से में हो रहे अत्याचारों के बारे में जानकारियाँ प्रकाशित होती थीं। इससे लोगों में आक्रोश भड़कने लगा था और वे ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए और भी उत्साहित हो उठे थे। इसकी आक्रामकता को देखते हुए अँग्रेज प्रशासन ने इसके लेखकों, संपादकों को तरह-तरह की प्रताड़नाएँ दीं, लेकिन यह पत्र अपने लक्ष्य पर डटा रहा।

इसी प्रकार बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र के क्षेत्रों से पत्रों का प्रकाशन होता रहा। उन पत्रों ने लोगों में स्वतंत्रता को पाने की ललक और जागरूकता फैलाने का प्रयास किया। अगर यह कहा जाए कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ये अखबार किसी हथियार से कमतर नहीं थे, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।