Saturday, January 15, 2011

पटकथा-लेखन

सारांश:


पटकथा-लेखन एक हुनर है। अंग्रेजी में पटकथा-लेखन के बारे में पचासों किताबें उपलब्ध हैं और विदेशों के खासकर अमेरिका के, कई विश्वविद्यालयों में पटकथा-लेखन के बाक़ायदा पाठ्यक्रम चलते हैं। लेकिन भारत में इस दिशा में अभी तक कोई पहल नहीं हुई। हिन्दी में तो पटकथा-लेखन और सिनेमा से जुड़ी अन्य विद्याओं के बारे में कोई अच्छी किताब छपी ही नहीं है। इसकी एक वजह यह भी है कि हिन्दी में सामान्यतः यह माना जाता रहा है कि लिखना चाहे किसी भी तरह का हो, उसे सिखाया नहीं जा सकता। कई बार तो लगता है कि शायद हम मानते हैं कि लिखना सीखना भी नहीं चाहिए। यह मान्यता भ्रामक है और इसी का नतीजा है कि हिन्दी वाले गीत-लेखन, रेडियो, रंगमंच, सिनेमा, टी.वी. और विज्ञापनों आदि में ज़्यादा नहीं चल पाए।
लेकिन इधर फिल्म और टी.वी के प्रसार और पटकथा-लेखन में रोजगार की बढ़ती सम्भावनाओं को देखते हुए अनेक लोग पटकथा-लेखन में रुचि लेने लगे हैं, और पटकथा के शिल्प की आधारभूत जानकारी चाहते हैं। अफसोस कि हिन्दी में ऐसी जानकारी देने वाली पुस्तक अब तक उपलब्ध ही नहीं थी।
‘पटकथा-लेखन : एक परिचय’ इसी दिशा में एक बड़ी शुरुआत है, न सिर्फ इसलिए कि इसके लेखक सिद्ध पटकथाकार मनोहर श्याम जोशी हैं, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने इस पुस्तक की एक-एक पंक्ति लिखते हुए उस पाठक को ध्यान में रखा है जो फिल्म और टी.वी में होने वाले लेखन का क, ख ग, भी नहीं जानता। प्राथमिक स्तर की जानकारियों से शुरू करके यह पुस्तक हमें पटकथा लेखन और फिल्म व टी.वी की अनेक माध्यमगत विशेषताओं तक पहुँचाती हैं, और सो भी इतनी दिलचस्प और जीवन्त शैली में कि पुस्तक पढ़ने के बाद आप स्वतः ही पटकथा पर हाथ आजमाने की सोचने लगते हैं।


1
देखने-सुनने की चीज है सिनेमा



कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि जिसे लिखना आता है वह कुछ भी लिख सकता है। लेकिन यह सच नहीं है। हर विधा की, हर माध्यम की अपनी अलग-अलग विशेषताएं होती हैं और उनके लिए लिख सकने के लिए अलग-अलग तरह की योग्यताएँ दरकार होती हैं। उदाहरण के लिए, पत्रकार से यह आशा की जाती है कि यथार्थ का कम-से-कम शब्दों में ज्यों-का-त्यों वर्णन करेगा और अपनी कल्पना से कोई काम नहीं लेगा। दूसरी ओर कहानीकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी कल्पना के सहारे यथार्थ को एक यादगार रंग देकर साहित्य के स्तर पर पहुंचा देगा।

साहित्य में यह सुविधा है कि शब्दों के सहारे किसी भी चीज का वर्णन किया जा सकता है और कैसी भी भावना उभारी जा सकती है। कोई पात्र क्या याद कर रहा है ? क्या सपने देख रहा है ? उसकी परिस्थिति क्या है ? मन:स्थिति क्या है ? अन्य पात्रों से उसके सम्बन्ध कैसे हैं ? उनके बारे में वह क्या सोचता है ? पात्रों की आपसी टकराहट से कब, कहाँ, क्या हो रहा है ? इस सबका शब्दों द्वारा वर्णन किया जा सकता है। लिखित साहित्य में एक अतिरिक्त सुविधा यह प्राप्त है कि अगर पाठक को कोई बात पहली बार पढकर समझ में न आए तो वह उसे फिर-फिर पढ़ सकता है।


वाचिक साहित्य, श्रव्य माध्यम


वाचिक (बोलकर सुनाए जानेवाले) साहित्य में श्रोता को यह सुविधा प्राप्त नहीं है। व्यास गद्दी पर विराजमान कथावाचक को श्रोता बार-बार नहीं टोक सकते कि हम समझ नहीं पाए, कृपया दुबारा कहें। इसलिए वाचिक साहित्य में बात को सरल शब्दों और वाक्यों में कहना होता है। यादगार और चुभती हुई बनाकर कहना होता है। मंच से गा-बोलकर सुनाए जाने वाले साहित्य में कलाकार कठिन प्रसंगों को दुहराने की या स्वयं ही ‘अर्थात्’ या ‘क्या कहा’ जैसे प्रश्न उठाकर खुलासा करने की युक्ति भी अपनाते हैं। लोक-नाटक ‘सांग’ में जब किसी हिंदी-उर्दू-गीत में कोई कठिन पंक्ति आती है तब संचालक सम्बद्ध पात्र से पूछता है कि उस पंक्ति का क्या मतलब है-यथा-‘‘अरी गुल बकावली, तू दो लम्बर पर के बोली ?’’ और फिर वह पात्र ठेठ हरियाणवी गद्य में पंक्ति विशेष का अर्थ बताता/बताती है।

वाचिक साहित्य के आधुनिक माध्यम रेडियो से नाटक प्रस्तुत करते हुए दोहराने-समझाने की ऐसी कोई गुंजाइश नहीं होती। यही नहीं, श्रोता बोलनेवाले को केवल सुनता है, देखता नहीं कि उसके चेहरे के भाव पढ़ सके। इस दृष्टि से रेडियो खालिस श्रव्य माध्यम है। इसके लिए ऐसा लेखक दरकार है जो सारा कथानक पात्रों की आपसी बातचीत और साउंड इफैक्ट यानी ध्वनि-प्रभाव के सहारे उजागर कर सके। फर्ज कीजिए कि दृश्य यह हो कि नायक-नायिका घोड़े पर सवार होकर अपना पीछा करते नायिका के घुड़सवार भाइयों से बचते हुए नाटक के गाँव की ओर बढ़ रहे हैं जो फिरोजा नदी के पार है, तो घोड़ों की टापों के ध्वनि-प्रभाव से और नायक-नायिका और भाइयों की आपसी बातचीत से पीछा किए जाने की स्थिति स्पष्ट करनी होगी और फिर नदी की कल-कल के ध्वनि-प्रभाव और नायक के संवाद से स्पष्ट करना होगा कि वह फिरोजा नदी आ गई है, जिसके पार उसका गाँव है।

साहित्य पढ़ने से ताल्लुक रखता है तो रेडियो सुनने से। उधर फिल्म और टी.वी. ऐसे माध्यम हैं जिनमें हम एक साथ देखते भी हैं, सुनते भी हैं, और पर्दे पर लिखा हुआ पढ़ भी सकते हैं। फिल्म और टी.वी. में हम घटनाओं को होता हुआ देखते हैं और पात्रों को बोलता हुआ सुनते हैं। इसीलिए इन्हें ऑडियो-विजुअल यानी दृश्य-श्रव्य माध्यम कहते हैं। यहाँ यह पूछा जा सकता है कि रंगमंच में भी तो हम घटनाओं को होता हुआ और पात्रों को बोलता हुआ सुनते हैं; तो फिर रंगमंच को ऑडियो-विजुअल क्यों नहीं कहते ? इसका जवाब यह है कि रंगमंच के लिए लिखा गया नाटक तो ‘साहित्य’ की श्रेणी में आता है क्योंकि उसमें सारी बात संवादों यानी शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत की जाती है। यह नाटक दर्शकों के सामने अभिनेताओं द्वारा खेला जाता है इसीलिए उसकी प्रस्तुति प्रदर्शन-कलाओं के अन्तर्गत आती है।


सिनेमा और नाटक


आप आपत्ति कर सकते हैं कि फिल्म और टी.वी. के लिए भी पटकथा लिखी जाती है और उसे डायरेक्टर यानी दिग्दर्शक के निर्देशन में ठीक उसी तरह खेला जाता है जैसे मंच पर। यह सवाल उठाना तीन बातों को भूल जाना है। पहली यह कि फिल्म और टी.वी. में रंगमंच की तरह नाटक दर्शकों के नहीं, एक कैमरे के सामने खेला जाता है। दूसरी यह कि जो एक बार खेल दिया जाता है वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि दर्शकों के प्रतिनिधि बने हुए कैमरों पर रंगमंच के दर्शक की तरह यह रोक नहीं होती कि वह अपनी ही सीट पर बैठकर तमाशा देखें, मंच पर न चढ़ आएँ। रंगशाला में आगे से आगे वाली सीट पर बैठे हुए दर्शकों और मंच पर खड़े पात्रों के बीच भी हमेशा एक दूरी बनी रहती है। सिनेमाघर में बैठे दर्शक के लिए कैमरा यह दूरी मिटा देता है। यही नहीं, कैमरा अपनी सीट पर ही बैठे दर्शक को पात्रों से चाहे जितनी दूरी पर भी, चाहे जितना ऊपर-नीचे ले जा सकता है।

कैमरा आगे-पीछे कहीं भी कितनी भी दूरी पर रखा जा सकता है। पास से दूर ले जाया जा सकता है और दूर से पास लाया जा सकता है। उसे ऊपर-नीचे ले जाया जा सकता है; अपनी धुरी पर घुमाया जा सकता है। पात्रों के सिर के ऊपर की ओर देखता हुआ रखा जा सकता है तो पात्रों के कदमों से भी नीचे से ऊपर की ओर देखता हुआ रखा जा सकता है। उसे समुद्र की गहराई में ले जाया जा सकता है और पर्वत की ऊंचाई पर भी। गोया कैमरा आजाद और बेढब करतब करके सब कुछ देख लेने को तैयार दर्शक बन जाता है। कैमरा दर्शक का नुमाइंदा बनकर किसी भी पात्र या वस्तु के नजदीक जा सकता है। वह किसी पात्र के चेहरे की छोटी-से-छोटी भाव-भंगिमा, उसके बदन का कोई छोटे-से-छोटे हिस्सा, कोई छोटी-से-छोटी वस्तु या उसका हिस्सा और किसी स्थल का छोटे-से-छोटा ब्यौरा दिखा सकता है। साथ ही वह चीजों को इतना बड़ा करके दिखा सकता है जितना कि पास आकर भी आँख से नहीं देखा जा सकता।

रंगमंच में यह सीमा भी होती है कि उसमें बहुत बड़ी-बड़ी चीजें नहीं दिखाई जा सकतीं। भव्य-से-भव्य मंच पर पानीपत की लड़ाई या एवरेस्ट विजय या सागर में टाइटैनिक जहाज का डूबना जैसे दृश्य नहीं दिखाए जा सकते। उधर कैमरा जैसे छोटी-से-छोटी चीज को दिखा सकता है, वैसे ही बड़ी-से-बड़ी चीज को भी। रंगमंच में सीमित ही सैट लग सकते हैं इसलिए सीमित ही घटना-स्थल रखे जा सकते हैं। उतना ही दिखाया जा सकता है जितना उन सैटों में हो सकता है। फिल्म और टी.वी. में ऐसी कोई सीमा नहीं है। आप चाहे जितने सैट बना सकते हैं और चाहे जितने बाहरी लोकेशनों पर जा सकते हैं। पात्रों को ले जाइए, कैमरा ले जाइए और लोकेशन पर शूट कर लाइए और फिर सबको जोड़कर दिखा दीजिए। एक तरफ से दर्शक के लिए फिल्म की खासियत ही यह बन जाती है कि उसमें घटना-स्थल बड़ी तेजी से बदलता रहता है।


बिम्ब बोलेंगे, हम नहीं


जहाँ रंगमंच के मुकाबले फिल्म में ये तमाम सुविधाएँ थीं, वहीं शुरू में उतनी ही बड़ी एक असुविधा भी थी कि चित्र के साथ ध्वनि अंकित नहीं की जा सकती थी। गोया सिनेमा गूँगा था। इस असुविधा ने एक नई भाषा को जन्म दिया जिसमें तस्वीरें ही खुद बोलती थीं। चित्रों के सहारे कहानी कह देने की यह कला कैमरे के पास-दूर, इधर-उधर जा सकने से मिलनेवाले तरह-तरह के चित्रों और इस तरह खींचे हुए चित्रों को उनमें सम्बन्ध पैदा करनेवाले क्रम से जोड़ने की युक्ति से विकसित हुई। मूकपट के दौर में दिग्दर्शकों ने इस कला में इतनी महारत हासिल कर ली कि बगैर संवाद सुने भी ज्यादातर कहानी दर्शकों की समझ में आने लगी। जहां बहुत ही जरूरी हुआ केवल वहीं संवाद को कार्ड में लिखकर फिल्मा लिया गया और पात्र के ओंठ खुलने के बाद दिखा दिया गया। बोलते बिम्बों का कमाल कुछ वर्षों पहले कमल हसन की मूक फिल्म ‘पुष्पक’ में देखा गया। उसमें तो कहीं कोई संवाद का कार्ड तक न था।

जब चित्र के साथ-साथ ध्वनि भी अंकित की जाने लगी तब मूकपट ने बोलचाल का रूप ले लिया। इससे संवादों का महत्त्व बढ़ा लेकिन इतना भी नहीं कि रंगमंच की तरह सारी बात संवादों के माध्यम से कही जाने लगे। कोई नाटक खेला और कैमरा दर्शक की तरह रखकर उसे दर्शा दिया ! मूकपट दर्शकों को बिम्बों की सशक्त भाषा का इतना आदी कर चुका था कि इस तरह से फिल्माया गया नाटक उन्हें बिलकुल बेजान लगता। इसीलिए बिम्बों का महत्त्व बना रहा और संवाद फिल्मों पर पूरी तरह हावी न हो सके। हां, नाटकों से इन नए माध्यमों ने ‘नाटकीयता की पकड़’ और ‘तीन अंकों वाला ढाँचा’ जरूर ज्यों-का-त्यों उधार ले लिया।

फिल्म और टेलीविजन में बिम्बों की भाषा और पात्रों के संवाद, दोनों का कहानी कहने में बड़ा महत्त्व है। लेकिन फिल्म और टेलीविजन में एक बड़ा अंतर यह है कि टेली-नायक में संवादों का महत्त्व लगभग उतना ही हो जाता है जितना नाटक में। इसकी वजह यह है कि टेलीविजन का पर्दा सिनेमा के पर्दे के मुकाबले में बहुत छोटा होता है उसमें कैमरा को बहुत दूर ले जाने से खास कुछ दिखता नहीं। इललिए ज्यादातर पात्रों के बोलते हुए चेहरे ही फिल्माए जाते हैं। गोया बिम्बों में ज्यादा विविधता नहीं रह पाती। दूसरी वजह यह है कि इस छोटे से पर्दे पर आते बिम्बों को दर्शक किसी बंद अँधेरे हॉल में नहीं, अपने घर के किसी रौशन कमरे में बैठे हुए देखते हैं। इसलिए उनकी आँखें पर्दे पर एकटक नहीं जमी रह पातीं। अगर पात्र चुप हो जाएँ तो ध्यान पर्दे से हट जाता है। फिर टेली-नाटकों के सीमित बजट में लोकेशनों पर जाना या बहुत ज्यादा सैट बनवाना सम्भव नहीं होता। रंगमंच की तरह उनमें भी कुछ ही सैटों में काम चलाना पड़ता है। इसलिए संवादों का महत्त्व बढ़ जाता है।


ऑडियो-विजुअल इमेजिनेशन


सिनेमा और टेलीविजन की विभिन्नता की बात बाद में विस्तार से की जा सकती है। अभी तो उनकी समानता की ओर ध्यान दिलाना है कि दोनों ही दृश्य-श्रव्ये माध्यम है। इनमें घटनाओं को होता हुआ दिखाया जाता है और पात्रों को बोलता हुआ। तो इस माध्यम के लिए लिखनेवाला व्यक्ति ऐसा होना चाहिए जो दृश्य-श्रव्य कल्पना का धनी हो। दृश्य-श्रव्य कल्पना उर्फ ‘ऑडियो-विजुअल इमेजिनेशन’ का अर्थ है अपने मानस-पटल पर घटनाओं को घटता हुआ देख सकना और पात्रों को आपस में संवाद करते हुए सुन सकना। ऐसा तभी हो सकता है जब आपका दिमाग भी फिल्म कैमरे की तरह काम करता हो और घटना और संवादों का ब्यौरा दर्ज करता रहता हो। यानी आप दृश्य-श्रव्य स्मृति के धनी हों।

यह मेरा सौभाग्य था कि मेरे साहित्यिक गुरु अमृतलालजी नागर यानी आप दृश्य-श्रव्य के धनी हो, की दृश्य-श्रव्य कल्पना अद्भुत थी। जब मैं लखनऊ में उनका चेला बना तब नागरजी सिनेमा जगत से साहित्य में लौटे थे। नागरजी को पहला ड्राफ्ट बोलकर शिष्यों से लिखवाने की आदत थी। यद्यपि वह सिनेमाघर से विरक्त होकर आए थे और हम शिष्यों को पटकथा लेखन सिखाने से साफ इनकार करते थे तथापि पटकथा लेखन की शैली का उन पर इतना गहरा असर था कि उनके बोले हुए ‘बूँद और समुद्र’ को कागज पर उतारना गोया पटकथा लेखन के बुनियादी तत्वों से परिचित होना था। पात्रों, परिस्थितियों और घटनाओं का सजीव वर्णन, पात्रों की पृष्ठभूमि और मन:स्थिति के अनुसार संवाद घटनाओं के माध्यम से चरित्र निरूपण और चरित्रों के घात-प्रतिघात से पैदा हुई घटनाएँ-पटकथा के ये तमाम नुस्खे मुझे नागरजी की वृत्तांत शैली में मिले। भगवतीचरण वर्मा के उपन्यासों में भी आप पटकथा का प्रभाव देख सकते हैं। वह भी बॉलीवुड में रह चुके थे।

द्रष्टव्य है कि नागरजी और भगवती बाबू दोनों ही बेहतरीन किस्सागो थे। घटनाओं का रस लेते हुए और रस देते हुए सजीव वर्णन करनेवाली किस्सागोई दृश्य-श्रव्य कल्पना की उपज होती है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग न सिर्फ ब्यौरेवार यह बता पाते हैं कि क्या हुआ, बल्कि यह भी सुनाते जाते हैं कि किसने कब क्या कहा ? कौन कैसा था ? क्या पहने हुए था ? आदि-आदि। ऐसे लोग दृश्य-श्रव्य स्मृति के धनी होते हैं। मेरी बहन इंटर की प्राइवेट परीक्षा देने के लिए मुरादनगर में एक हफ्ता बिताकर जब लौटी तब उसने महीनों तक वहाँ के किस्से सुना-सुनाकर हमारा मनोरंजन किया। ठीक तीस साल बाद जब उसकी छोटी बेटी दो साल अमेरिका में रहकर लौटी तब उसके अमेरिका प्रवास की सारी कहानी 20-25 मिनट में खत्म हो गई। मेरी भांजी मास कॉम की छात्रा होने के नाते पटकथा लेखन की जानकारी रखती है पर उसमें दृश्य-श्रव्य स्मृति का अभाव है। उधर मेरी बहन भरपूर दृश्य-श्रव्य-स्मृति और कल्पना की धनी है।


किस्सागो, बनिए


अफसोस, पेशेवर किस्सागो अब नहीं रहे ! वरना मैं आपसे कहता कि दृश्य-श्रव्य कल्पना का कमाल देखना हो तो उनकी किस्सागोई का आनंद लेने जाए। वे न सिर्फ यह बताते थे कि किस क्रम से क्या-क्या कहा। बल्किन नकलें उतार-उतार कर यह भी थे किसने किस अंदाज में क्या-क्या कहा। बल्कि वह पात्रों की मन:स्थिति और प्रतिक्रियाओं का भी आभास देते जाते थे-कुछ अपने शब्दों से और कुछ अपने अभिनय से। इस तरह से सारी घटना को उसकी पूरी नाटकीयता के साथ श्रोता के लिए उजागर कर देते। अगर कहीं कोई पेशेवर किस्सागो अब भी हो तो उसे जरूर सुनें। नहीं तो मेरी बहन सरीखे जो गैर-पेशेवर किस्सागो आपकी जानकारी में हों उनकी बातों का रस लें। लोकमंच की कुछ विधाओं में और धार्मिक प्रवचनों में आज भी जबरदस्त किस्सागोई की बानगी आपको मिल सकती है।

हाल में मैंने व्यास गद्दी पर बैठे एक कथावाचक को महाभारत का एक प्रसंग इस तरह प्रस्तुत करते हुए सुना-‘‘वहां पहुंचकर अर्जुन क्या देखता है कि भगवान श्रीकृष्ण शयन कर रहे हैं और दुर्योधन सिरहाने खड़ा है। दुर्योधन को वहां देखकर अर्जुन झटका खा जाता है कि अरे, ये तो मुझसे भी पहले पहुँच गए। खैर वह जाकर श्रीकृष्ण भगवान के पैताने बैठकर प्रभु के श्रीचरण दबाने लगता है। थोड़ी देर में प्रभु की आँख खुलती हैं। उन्हें पैताने बैठा अर्जुन पहले नजर आता है। प्रभु पूछते हैं बताओं, किस कारण आए ? अर्जुन हाथ जोड़कर निवेदन करता है कि मैं युद्ध में आपकी सहायता लेने आया हूँ। तब दुर्योधन बात को बीच में काटकर कहता है कि सहायता के लिए इससे पहले मैं आया हूँ, पहले मेरी बात सुनी जाए। प्रभु उठ बैठते है और मुसकराकर कहते हैं कि आए तुम जरूर पहले होगे मगर पैताने बैठा अर्जुन मुझे पहले नजर आया। दुर्योधन आपत्ति करता है कि यह अन्याय वाली बात होगी। प्रभु फिर मुसकराते हैं और कहते हैं कि देखो, मैं पूरा न्याय करूँगा-दोनों को सहायता देकर। तुममे से एक व्यक्ति मेरी सारी सेनाएँ ले लो और दूसरा सिर्फ मुझे। श्रीकृष्ण भगवान पहले अर्जुन को पूछतें हैं, तुम्हें क्या चाहिए ? दुर्योधन का चेहरा चिंता से खिंच जाता है कि अब यह सारी सेना माँग लेगा। लेकिन श्रीकृष्ण भक्त अर्जुन कहता है मुझे आप चाहिएं प्रभु, आपकी सेनाएँ नहीं। और मूर्ख दुर्योधन इसे अर्जुन की मूर्खता समझकर खुश होता है।’’
अगले परिच्छेद में आप देखेंगे कि कथावाचक की यह शैली ही पटकथा लेखन की शैली है।


2
पटकथा क्या बला है ?



तो मैं कह रहा था कि कथावाचक और किस्सागो अक्सर पटकथा की शैली अपनाते हैं। यह पटकथा की शैली क्या है और कहानी कहने के आम ढंग से वह किस तरह अलग हैं, यह जानने के लिए कोई पटकथा पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। फिल्म देखकर आए हुए किसी भी व्यक्ति से फिल्म की कहानी सुन लीजिए, बात साफ हो जाएगी।

एक बार मैने ‘दिल वाले दुल्हनियाँ ले जाएँगे’ देखकर आई अपनी भतीजी से उस फिल्म की कहानी पूछी तो उसने कुछ इस तरह कहा-काजोल लंदन में दुकान खोले हुए कठोर अमरीशपुरी और सदय फरीदा जलाल की बेटी होती है। हालाँकि काजोल लंदन में पली-बढ़ी होती है। अमरीशपुरी उस पर अपने भारतीय गाँव से मिले हुए संस्कार थोपता रहता है। काजोल बेचारी उससे बहुत डरती है। अमरीशपुरी उसका ब्याह बचपन में ही भारत में अपने दोस्त के बेटे से तय कर चुका होता है। काजोल को यह बात बेतुकी लगती है, पर वह बाप से कुछ नहीं कह पाती। शाहरूख खान मस्तमौला विधुर अनुपम खेर का बेटा होता है। बाप-बेटा दोनों दोस्त-जैसे होते हैं। एक रात शाहरूख खान जरूरी दवा खरीदने के बहाने अमरीशपुरी की बंद दुकान खुलवा देता है और बीयर ले जाता है। इससे अमरीशपुरी को शाहरूख खान बहुत घटिया लड़का लगता है। उधर फरीदा जलाल अपने पति से चिरौरी करके बेटी को भारत लौटने से पहले सहेलियों के साथ यूरोप यात्रा पर जाने की इजाजत देती है। वहीं उसकी मुलाकात शाहरूख खान से होती है। तकरार के बाद दोनों में प्यार हो जाता है। लंदन लौटने पर अमरीशपुरी को इस बात का पता चलता है और वह काजोल को लेकर पंजाब चल देता है, सादी करवाने।’’

आप गौर करेगे कि यह काहनी कहने का सामान्य ढंग नहीं है। आमतौर से तो कहानियाँ ‘एक था राजा’ वाली शैली में लिखी जाती हैं। उसे कहने या लिखनेवाला एक ऐसी घटना बयान कर रहा होता जो अतीत में घट चुकी है। इसलिए वह भूतकालीन क्रियापदों का उपयोग करता है-‘‘एक राजा था जो अपनी रानी से बहुत प्यार करता था। लेकिन उसे इस बात का बहुत दुख था कि रानी को कोई संतान न थी।’’

इस हिसाब से तो मेरी भतीजी को कहानी कुछ इस तरह सुनानी चाहिए थी-‘लंदन नगर का भारतीय दुकानदार अमरीशपुरी रूढ़िवादी विचारो का था इसलिए अपनी बेटी काजोल पर कड़ा अंकुश रखता था। काजोल जितना ही उससे डरती थी उतना ही अपनी दयालु माँ फरीदा जलाल से प्यार करती थी। अमरीश चाहता था कि उसकी बेटी भारत में उसके दोस्त के बेटे से शादी करे। मगर काजोल उस शाहरूख खान को दिल दे बैठी थी जिसने उसके पिता को एक दिन नाराज कर दिया था।’’ मगर मेरी भतीजी ने कहानी इस तरह नहीं सुनाई। और वह कोई अपवाद नहीं है। आप किसी से भी किसी फिल्म की कहानी, सुनें, वह मेरी भतीजी वाली शैली में सुनाएगा। कोई यह नहीं कहेगा कि ‘हीरो को गुस्सा आ गया’ या ‘हीरोइन ने जहर पी लिया’ आपको उससे यही सुनने को मिलेगा कि ‘हीरो गुस्सा हो जाता है’, ‘हीरोइन जहर पी लेती है।’ ऐसा इसलिए होता है कि दर्शक फिल्म में घटनाओं को होता हुआ और पात्रों को बोलता हुआ सुनता है। फिल्म में अतीत सतत नहीं, वर्तमान दर्शाया जाता है। इसलिए फिल्म की कहानी सुनाते हुए हम अनिश्चित वर्तमान काल के क्रियापदों का प्रयोग करने लगते हैं। एक राजा था की जगह हम कहते हैं, ‘एक राजा होता है।’

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